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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 262

विनय-पत्रिका २५१ ज्यों-ज्यों आप शीलमें पड़कर इसे ढील दे रहे हैं, त्यों-त्यों यह नीच सिरपर चढ़ता जा रहा है। यदि आप क्रोधके साथ डाँटकर इसे मना कर दें, तो यह उसी प्रकार मुरझा जायगा जैसे तर्जनी अँगुली दिखानेसे कुम्हड़ेकी बतिया ॥८॥ मैं आपकी बलैया लेता हूँ, आप न्याय कीजिये, नहीं तो अब पृथिवी आनन्द-मंगलसे खाली होती जा रही है। ऐसा कीजिये, जिससे लोग सौभाग्यशाली होकर प्रेमके साथ कहें कि श्रीरामजीने कृपाकी दृष्टिसे देखा है ॥९॥ मेरी यह विनती सुनकर (भग- वान्ने) हँसकर आनन्दित भावसे मेरी ओर देखा, और करुणजलसे पृथिवीको भिगो दिया। राम-राज्य होनेसे सब काम हो गया। शुभ शकुन होने लगे, क्योंकि महाराज श्री रामजी संसारविजयी हैं ॥१०॥ वह बड़े सामर्थ्यवान हैं तथा चतुर और अच्छे स्वामी हैं। उन्होंने सुकृत (पुण्य) रूपी सेनाको हारनेसे जिता दिया है। उनके उत्तम भक्त स्वभावतः आदरपूर्वक उनकी सराहना करते हैं कि उन्होंने अनायास ही कष्टको बिता दिया—दूर कर दिया ॥११॥ उखड़े हुएको स्थापित करना, उजड़े हुएको बसाना और गयी हुई वस्तुको फिरसे दिलाना ही उनका सदैवका बाना है (यही उनकी बानि या आदत है)। तुलसीदासके प्रभु श्रीरामजी आर्त्तोंकी आर्त्तता हरनेवाले हैं। उन्होंने किस-किसको अभय बाँह नहीं दी ? अर्थात् किसकी रक्षा नहीं की ? ॥१२॥

विशेष १—'त्यों त्यों नीच...दई है' इसपर गोस्वामीजीने दोहावलीमें भी लिखा है:— नीच चंग सम जानिबो, सुनि लखि तुलसीदास । ढीलि देत भुइँ गिरि परत, खैंचत चढ़त अकास ॥ २—'कुम्हड़ेकी जई है'—कुम्हड़ेकी बतिया तर्जनी अँगुली दिखा देनेपर मर जाती है। इसे गोस्वामीजीने रामायणमें इस प्रकार कहा है:— इहाँ कुम्हड़ बतिया कोउ नाहीं। जो तर्जनी देखि मरि जाहीं ॥ ३—इस पदमें गुसाईंजीके हृदयमें, लोकोपकारका भाव कितना अधिक था, यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है। पहले ब्राह्मणोंके ऐश्वर्यकी हानि कही गयीं