भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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२५२ विनय-पत्रिका

है, उसके बाद क्षत्रियोंका पतन। दोनों उच्च वर्णोंकी भ्रष्टता कहकर समुदाय रूपमें संसारका दुःख दिखाया गया है। जैसे कोई राजा दूसरे देशपर चढ़ाई करके पहले उस देशके किलेपर अधिकार करता है, और पीछे सब देश स्वयं ही उसके अधीन हो जाता है, उसी प्रकार कलिकालरूपी राजाने संसारको दखल करनेके लिए धर्मके कलारूपी ब्राह्मण-क्षत्रियोंको जीत लिया है, अतः अन्य वर्णाश्रम आदि अपने आप ही उसके वशमें हो गये हैं।

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ते नर नरक-रूप जीवत जग भवभंजन-पद-विमुख अभागी। निसिवासर रुचिपाप असुचिमन, खलमति-मलिन, निगमपथ-त्यागी ॥१॥ नहिं सतसंग, भजन नहिं हरि को श्रवन न राम-कथा अनुरागी। सुत-बित-दार-भवन-ममता-निसि सोवत अति, न कवहूँ मति जागी ॥२॥ तुलसिदास हरिनाम-सुधा तजि, सठ हठि पियत विषय-विष माँगी। सूकर-स्वान-सृगाल-सरिसजन, जनमत जगत जननि-दुख लागी ॥३॥

भावार्थ—वे मनुष्य संसारमें नरकरूप होकर जीते हैं और अभागे हैं जो भव-भय-भंजन करनेवाले भगवच्चरणोंसे विमुख हैं। रातदिन उनकी रुचि पापमें रहती है, और मन अपवित्र रहता है। वैदिक मार्गको त्यागकर उनकी दुष्ट बुद्धि मलिन रहती है ॥१॥ न तो वे सत्संग करते हैं और न भगवान्‌का भजन ही। राम-कथा सुननेमें भी उनका प्रेम नहीं रहता। वे पुत्र, धन, स्त्री और घरकी ममतारूपी रात्रिमें अचेत होकर सोते रहते हैं; उनकी बुद्धि (इस ममतारात्रिमें) कभी जागती ही नहीं ॥२॥ तुलसीदासका कथन है कि वे दुष्ट रामनामामृतको छोड़कर हठ-पूर्वक विषयरूपी विष माँग-माँगकर पीते हैं। ऐसे मनुष्य सूअर, कुत्ते