विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २५३ और सियारके समान संसारमें केवल अपनी माताको दुःख देनेके लिए जन्म लेते हैं ॥३॥ [१४१] रामचन्द्र रघुनायक तुमसों हौं बिनती केहि भाँति करौं । अघ अनेक अवलोकि आपने, अनघ नाम अनुमानि डरौं ॥१॥ पर-दुख दुखी सुखी पर-सुख ते, संत-सील नहिं हृदय धरौं । देखि आनकी विपति परम सुख, सुनि संपति बिनु आगि जरौं ॥२॥ भगति-विराग-ग्यान साधन कहि बहुविधि डहँकत लोग फिरौं । सिव-सरवस सुखधाम नाम तव, वेंचि नरकप्रद उदर भरौं ॥३॥ जानत हौं निज पाप जलधि जिय, जल-सीकर सम सुनत लरौं । रज-समपर-अवगुन सुमेरु करि, गुन गिरि-सम रजते निदरौं ॥४॥ नाना वेष बनाय दिवस-निसि, पर-वित जेहि तेहि जुगुति हरौं । एकौ पल न कवहूँ अलोल चित हित दै पद-सरोज सुमिरौं ॥५॥ जो आचरन बिचारहु मेरो, कलप कोटि लगि औटि मरौं । तुलसिदास प्रभु कृपा-बिलोकनि, गोपद-ज्यों भवसिंधु तरौं ॥६॥ शब्दार्थ—अनघ = पाप रहित । डहँकत = ठगता हुआ । सीकर = बूँद, कण । रज = धूल । अलोल = स्थिर, शान्त । औटि = औटाकर, खौलाकर । भावार्थ—हे रघुनायक श्रीरामचन्द्रजी ! मैं आपसे किस प्रकार विनती करूँ ? क्योंकि मैं अपने अनेक पापोंको देखता हुआ आपके पाप-रहित नामका अनुमान करके डर रहा हूँ ॥१॥ दूसरेके दुःखसे दुखी और दूसरेके सुखसे सुखी होना जो सन्त-स्वभाव है, उसे मैं अपने हृदयमें धारण नहीं करता । (मेरा तो यह स्वभाव है कि) मैं दूसरेकी विपत्ति देखकर प्रसन्न होता हूँ और दूसरेकी सम्पत्तिका हाल सुनकर (देखनेको कौन कहे) बिना आगके ही जलने लगता हूँ ॥२॥ मैं भक्ति, वैराग्य, ज्ञान और साधनोंकी बातें कहकर नाना प्रकारसे लोगोंको ठगता फिरता हूँ । आपका जो नाम सुखका धाम और शिवजीका सर्वस्व है, उसी नामको मैं बेचकर नरकप्रद (नरकमें पहुँचानेवाला) पेटको भरता हूँ ॥३॥ (यद्यपि) मैं अपने हृदयमें जानता हूँ कि मेरे पाप समुद्रके समान (अपार) हैं, फिर भी (जब मैं