विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ विनय-पत्रिका दूसरोंके मुखसे अपना) जल-कणके समान (जरासा) पाप भी सुनता हूँ, तो उससे लड़ पड़ता हूँ; अर्थात् दूसरेके मुखसे अपने पापकी बात सुनकर सहन नहीं करता। किन्तु मैं दूसरोंके रजके समान (थोड़ेसे) अवगुणको सुमेरुगिरि पर्वतके समान, और पर्वतके समान गुणको रज-कणके समान बतलाकर उनका निरादर करता हूँ ॥४॥ नाना प्रकारके वेष बनाकर दिन-रात जैसे-तैसे छलोंसे दूसरेका धन हरण करता हूँ, किन्तु कभी एक पल भी स्थिर चित्तसे हित करनेवाले आपके पद-पद्मका स्मरण नहीं करता ॥५॥ यदि आप मेरे आचरणपर विचार करेंगे, तो मुझे करोड़ों कल्पतक खौलकर मरना पड़ेगा—कभी उद्धार न होगा; किन्तु हे प्रभो ! आपकी कृपा-दृष्टि होते ही मैं तुलसीदास संसार-समुद्रको गो-खुरके (जलके) समान पार कर जाऊँगा ॥६॥ विशेष १—'देखि··········आगि जरौं'—यहाँ गुसाईंजीने दूसरेकी विपत्तिको तो देखनेपर सुखी होनेके लिए कहा है और दूसरेकी सम्पत्तिको सुनकर जलनेके लिए कहा है। तात्पर्य यह है कि दूसरोंकी सम्पत्तिको आँखसे देखनेपर ही परम सुख होता है—सुनकर उतना नहीं। अर्थात् इतना कठोर हृदय है। किन्तु— दूसरेकी सम्पत्तिको देखनेके लिए कौन कहे, उसकी सम्पत्तिका हाल सुनते ही जला जाता हूँ,—यदि प्रत्यक्ष देखूँ, तब तो न जानें क्या गति हो। [१४२] सकुचत हौं अति राम कृपानिधि ! क्यों करि विनय सुनावौं। सकल धरम-विपरीत करत, केहि भाँति नाथ ! मन भावौं ॥१॥ जानत हौं हरि रूप चराचर, मैं दृष्टि नयन न लावौं। अंजन केस-सिखा जुवती, तहँ लोचन-सलभ पठावौं ॥२॥ श्रवननि को फल कथा तुम्हारी, यह समुझौं, समुझावौं। तिन्ह श्रवननि परदोष निरन्तर सुनि सुनि भरि-भरि तावौं ॥३॥ जेहि रसना गुन गाइ तिहारे, बिनु प्रयास सुख पावौं। तेहि मुख पर अपवाद भेक ज्यों रटि-रटि जनम नसावौं ॥४॥