विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २५५ 'करहु हृदय अति विमल बसहिं हरि', कहि कहि सबहि सिखावौँ । हौं निज उर अभिमान-मोह-मद, खल-मण्डली बसावौँ ॥५॥ जो तनु धरि हरिपद साधहिं जन, सो बिनु काज गँवावौँ । हाटक-घट भरि धर्यो सुधा गृह, तजि नभ कूप खनावौँ ॥६॥ मन-क्रम बचन लाइ कीन्हें अघ, ते करि जतन दुरावौँ । पर-प्रेरित इरषा वस कबहुँक किय कछु सुभ, सो जनावौँ ॥७॥ बिप्र-द्रोह जनु बाँट पर्यो, हठि सबसों बैर बढ़ावौँ । ताहू पर निज मति-विलास सब संतन माँझ गनावौँ ॥८॥ निगम सेस सारद निहोरि जो अपने दोष कहावौँ । तौ न सिराहिं कलप सत लगि प्रभु, कहा एक मुख गावौँ ॥९॥ जो करनी आपनी विचारौं, तौ कि सरन हौं आवौँ । मृदुल सुभाव सील रघुपति को, सो बल मनहिं दिखावौँ ॥१०॥ तुलसिदास प्रभु सो गुन नहिं, जेहि सपनेहुँ तुमहिं रिझावौँ । नाथ-कृपा भव-सिंधु धेनुपद-सम जो जानि सिरावौँ ॥११॥ शब्दार्थ—अंजन-केस = अगिन । तावाँ = मूँदता हूँ, बन्द करता हूँ। भेक = मेढक । गवावौँ = खो रहा हूँ। हाटक = सुवर्ण । दुरावौँ = छिपाता हूँ। बाँट = हिस्से । रिझावौँ = प्रसन्न कर सकूँ । सिरावौँ = सन्तोष कर लेता हूँ । भावार्थ—हे कृपानिधि राम ! मैं सकुच रहा हूँ, आपको अपनी विनती कैसे सुनाऊँ । हे नाथ ! मैं सब काम धर्म-विरुद्ध करता हूँ, ऐसी दशामें भला मैं किस प्रकार आपको अच्छा लगूँगा ? ॥१॥ यद्यपि यह मैं जानता हूँ कि संसारमें जड़-चैतन्य जितने भी प्राणी हैं, सब परमात्माके स्वरूप हैं, तथापि मैं जबर्दस्ती उन्हें (ईश्वररूपमें) नहीं देखता। मैं तो अपने नेत्र-रूपी पतंगोंको युवती- रूपी अग्नि-शिखामें (जलनेके लिए) भेजता हूँ ॥२॥ आपकी कथा सुननेमें ही कानोंकी सार्थकता है, यह मैं समझता हूँ और दूसरोंको भी यही समझाता हूँ; किन्तु उन कानोंसे मैं निरन्तर और दूसरोंके दोष सुन-सुनकर, उसे उन्हीं (दूसरेके दोषों) से भर-भरकर बन्द करता हूँ (जिसमें वे निकलने न पावें) ॥३॥ जिस जीभसे आपके गुण गाकर मैं बिना परिश्रमके ही परमानन्द पा सकता हूँ, उस मुखसे मेढककी तरह दूसरोंकी बुराइयाँ रट-रटकर अपना