विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ विनय-पत्रिका जन्म नष्ट कर रहा हूँ ॥४॥ सबको सिखलाता तो हूँ यह कह-कहकर कि 'अपना हृदय खूब स्वच्छ कर डालो ताकि उसमें परमात्मा निवास करें', किन्तु मैं स्वयं अपने हृदयमें अभिमान, मोह और मद आदि खलोंकी मण्डली बसाता हूँ ॥५॥ जिस शरीरसे भक्तजन भगवान्के परम पदको प्राप्त करनेकी साधना करते हैं, उस मनुष्य शरीरको मैं व्यर्थ गँवा रहा हूँ । घरमें सोनेका घड़ा अमृतसे भरा हुआ रखा है, किन्तु उसे छोड़कर आकाशमें कुआँ खुदवा रहा हूँ ॥६॥ मन, वचन और कर्मसे मैंने जो पाप किये हैं, उन्हें तो मैं यत्नपूर्वक छिपाता हूँ , किन्तु यदि दूसरेकी प्रेरणासे, अथवा ईर्ष्यावश कभी कोई शुभ कर्म हो गया है, तो उसे (चारों ओर) जनाता फिरता हूँ ॥७॥ ब्राह्मण-द्रोह तो मानो मेरे हिस्से पड़ गया है। जबर्दस्ती सबसे वैर बढ़ाता हूँ । इतनेपर भी अपनी बुद्धिके विलास- को (अपनी कृतियोंको) सब सन्तोंके बीच गिनाता हूँ, अर्थात् मैं भी सन्त बनता हूँ ॥८॥ यदि मैं वेद, शेषनाग और शारदा आदिका निहोरा करके उनसे अपने दोषोंको कहलाऊँ, तो भी हे प्रभो ! वे सैकड़ों कल्पतक समाप्त नहीं हो सकते; फिर भला मैं एक मुखसे उन्हें कहाँतक कहूँ ? ॥९॥ यदि कहीं मैं अपनी करनीपर विचार करूँ, तो क्या मैं आपकी शरणमें कभी आ सकता हूँ ? किन्तु मैं अपने मनको इसी बातका बल दिखाया करता हूँ कि श्रीरामजीका शील- स्वभाव कोमल है । ॥१०॥ हे प्रभो ! मुझ तुलसीदासमें वह गुण ही नहीं है जिससे मैं आपको स्वप्नमें भी रिझा सकूँ । किन्तु हे नाथ ! आपकी कृपासे यह भवसागर गायके खुरके समान हो जाता है, इसलिए कोई साधन न होनेपर भी मैं भवसागरको पार कर जाऊँगा, यह जानकर सन्तोष कर लेता हूँ ॥११॥ विशेष १—'तावौं'—वियोगी हरिजीने इस शब्दका अर्थ किया है, 'दृढ़तासे धारण करता हूँ, उमंगसे फूला नहीं समाता ।' विचित्र अर्थ है । २—'मति-विलास'—इसका अर्थ 'बुद्धिका विलास' हो सकता है । [१४३] सुनहु राम रघुवीर गुसाईं, मन अनीति-रत मेरो । चरन-सरोज बिसारि तिहारे, निसिदिन फिरत अनेरो ॥१॥