भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 228

विनय-पत्रिका २१७ ( १२२ ) मैं हरि, साधन करइ न जानी। जस आमय भेषज न कीन्ह तस, दोष कंहा दिरमानी ॥१॥ सपने नृप कहँ घटै विप्र-बध, बिकल फिरै अघ लागे। वाजिमेध सत कोटि करै नहिं सुद्ध होइ बिनु जागे ॥२॥ स्त्रग महँ सर्प विपुल भयदायक, प्रगट होइ अविचारे। बहु आयुध धरि, वल अनेक करि हारहि मरइ न मारे ॥३॥ निज भ्रम ते रवि-कर-संभव सागर अति भय उपजावै। अवगाहत बोहित नौका चढ़ि कवहूँ पार न पावै ॥४॥ तुलसिदास जग आपु सहित जब लगि निरमूल न जाई। तब लगि कोटि कलप उपाय करि मरिय, तरिय नहिं भाई ॥५॥ शब्दार्थ—आमय = रोग। भेषज = दवा। दिरमानी = हिकमत (यह अरबी भाषाका शब्द है। किसी-किसी प्रतिमें 'दिरमानी' की जगह 'वरवानी' पाठ है)। स्त्रग = माला। अवगाहत = डूबता है। बोहित = जहाज। भावार्थ—हे हरे ! मैंने साधन करना नहीं जाना। जैसा रोग था, वैसी दवा नहीं की, इसमें हिकमत (दवा) का दोष ही क्या है? ॥१॥ स्वप्नमें किसी राजाको ब्रह्महत्या लग जानेपर वह उस पापके कारण विकल होकर घूमता है, पर चाहे वह सौ करोड़ अश्वमेध यज्ञ कर डाले—बिना जागे शुद्ध नहीं होता (वैसे ही तत्त्वज्ञानके बिना अज्ञान-जनित पापोंसे छुटकारा नहीं होता) ॥२॥ अज्ञानके कारण मालामें बड़े भयानक सर्पका भ्रम पैदा हो जाता है; किन्तु वह बहुत-से हथियारोंके द्वारा अनेक तरहका बल-प्रयोग करके मारते-मारते हार जानेपर भी नहीं मरता (मरता तभी है, जब सर्पकी भ्रान्ति दूर हो जाती है) ॥३॥ अपने ही भ्रमसे सूर्यकी किरणोंसे उत्पन्न हुआ (मृगजलका) समुद्र अत्यधिक भय उत्पन्न करता है और उसमें डूबकर जहाज या नावपर चढ़नेसे कोई पार नहीं पाता ॥४॥ तुलसीदास कहते हैं कि जबतक अहंपनके सहित संसारका निर्मूल नाश न होगा, तबतक हे भाई ! करोड़ों कल्पतक उपाय करते- करते मर जाओ, पर संसार-सागरसे पार नहीं हो सकते ॥५॥ (सारांश, जैसे