विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ विनय-पत्रिका जो जग मृषा ताप-त्रय-अनुभव होइ कहहु केहि लेखे। कहि न जाय मृगबारि सत्य, भ्रम ते दुख होइ बिसेखे ॥२॥ सुभग सेज सोवत सपने, बारिधि बूडत भय लागै। कोटिहुँ नाव न पार पाव सो, जब लगि आपु न जागै ॥३॥ अनविचार रमनीय सदा, संसार भयंकर भारी। सम-संतोष-दया-विवेक तें, व्यवहारी सुखकारी ॥४॥ तुलसिदास सब विधि प्रपंच जग जदपि झूठ श्रुति गावै। रघुपति, भगति, संत-संगति बिनु, को भव-त्रास नसावै ॥५॥ शब्दार्थ-मृगबारि = मृगजल। आपु = स्वयं। भावार्थ-हे हरे ! यह भ्रमकी ही विशेषता है कि देखते, सुनते और समझते रहनेपर भी संशय और सन्देह दूर नहीं हो रहा है ॥१॥ यदि यह कहो कि जब संसार मिथ्या ही है, तो फिर त्रिविध तापोंका अनुभव किस प्रकार होता है (क्योंकि संसारके मिथ्या होनेपर उसके तापोंका मिथ्या होना स्वाभाविक है)-तो (इसका उत्तर यह है कि) मृगजल सत्य नहीं कहा जा सकता, किन्तु भ्रमवश विशेष दुःख होता ही है ॥२॥ स्वप्नमें सुन्दर सेजपर सोया हुआ मनुष्य समुद्रमें डूबनेसे भयभीत होता है; किन्तु जबतक वह स्वयं नहीं जागता, तबतक करोड़ों नावोंके रहनेपर भी पार नहीं जा पाता ॥३॥ यह बड़ा ही भयंकर संसार विचार न रहनेके कारण ही सदैव रमणीय दिखाई देता है। हाँ, सम, सन्तोष, दया और विवेकयुक्त व्यवहार करनेवालोंके लिए (यह भयानक संसार) सुखकर अवश्य है ॥४॥ तुलसीदास कहते हैं कि यद्यपि संसारका प्रपंच सब तरहसे झूठा है—ऐसा वेदोंका कथन है, फिर भी रामजीकी भक्ति और सन्त- जनोंकी संगतिके बिना संसार-भयको कौन दूर कर सकता है ? ॥५॥ विशेष १-‘संशय-संदेह’—देखनेमें दोनों शब्द एक ही अर्थके द्योतक प्रतीत हो रहे हैं, पर दोनों शब्दोंका भिन्न-भिन्न आशय है। यहाँपर ‘संशय’ शब्दसे अभिप्राय है, ‘मिथ्या जगत्को सत्य मानना’ और ‘सन्देह’ शब्दसे अभिप्राय है ‘केवल परमात्माकी ही सत्ता है या और कुछ’।