भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 226

विनय-पत्रिका २१५ अर्थ अविद्यमान जानिय संसृति नहिं जाइ गुसाँईं । बिनु बाँधे निज हठ सठ परबस पर्यो कीर की नाईं ॥२॥ सपने व्याधि विविध बाधा जनु मृत्यु उपस्थित आई । बैद अनेक उपाय करै जागे बिनु पीर न जाई ॥३॥ श्रुति-गुरु-साधु-स्मृति-संमत यह दृश्य असत दुखकारी । तेहि बिनु तजे, भजे बिनु रघुपति, विपति सकै को टारी ॥४॥ बहु उपाय संसार-तरन कहँ, विमल गिरा श्रुति गावै । तुलसिदास मैं-मोर गये बिनु जिउ सुख कबहुँ न पावै ॥५॥ शब्दार्थ—अविद्यमान = नाशवान्, क्षणभंगुर । संसृति = संसार, क्लेश । कीर = तोता । भावार्थ—हे हरे ! आप मेरे इस भारी भ्रमको क्यों नहीं दूर करते ? यद्यपि यह संसार मिथ्या है, तथापि जबतक आपकी कृपा नहीं हो रही है, तबतक यह सत्य-सा भास रहा है ॥१॥ यह मैं जानता हूँ कि इन्द्रियोंके विषय झूठे हैं, तथापि हे गुसांई ! क्लेश दूर नहीं हो रहा है (संसार बना है)। बिना (किसीके) बाँधे ही मैं अपने हठसे शठतावश तोतेकी तरह दूसरेके अधीन पड़ा हूँ ॥२॥ जैसे किसीकी स्वप्नमें रोगकी अनेक तरहकी बाधाओंसे मृत्यु निकट आ जाय और वैद्य अनेक उपाय करें, किन्तु जागे बिना दुःख दूर नहीं हो सकता (वैसे ही भ्रममें पड़कर हमलोग पीड़ा भोग रहे हैं और उसे दूर करनेके लिए मिथ्या उपाय कर रहे हैं, पर बिना तत्त्वज्ञानके उससे छुटकारा नहीं मिल सकता) ॥३॥ वेद, गुरु, साधु और स्मृतियोंकी सम्मति है कि यह दृश्य (दिखलाई पड़नेवाला जगत्) असत् है—दुःखदायक है । इसे त्यागकर श्रीरामजीका भजन किये बिना सांसारिक दुःखोंको कौन टाल सकता है ? ॥४॥ वेद निर्मल वाणीसे कह रहे हैं कि संसार-सागरको पार करनेके लिए बहुत-से उपाय हैं; किन्तु तुलसीदास कहते हैं कि ‘मैं और मेरा’ भाव नष्ट हुए बिना इस जीवको कभी भी सुख नहीं मिलता ॥५॥ [ १२१ ] हे हरि ! यह भ्रम की अधिकाई । देखत, सुनत, कहत समुझत संसय-संदेह न जाई ॥१॥