भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 475 में से

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पृष्ठ 224

शब्दार्थ-गज = हाथी । दसन = दाँत । बच्छ = बछड़ा । चारु = सुन्दर । मयूर = मोर । सविष = विषके सहित । निरमत्सर = ईर्ष्यारहित । भावार्थ-हे हरे ! मैं किस तरह (उपायसे) सुख मानूँ ? जैसे हाथीके दाँत (दिखानेके तो और होते हैं किन्तु खानेके और) होते हैं, वैसे ही मेरी करनी है । (दिखानेके लिए तो आपका दास बना हूँ, किन्तु मेरा अन्तःकरण विषयोंका दास है), इसे आप भली भाँति जानते भी हैं ॥१॥ जो कुछ कहे, उसे करे, (ऐसा करनेसे मनुष्य) भवसागरको इस प्रकार पार कर जाता है जैसे बछड़ेका पैर; अर्थात् अपने कथनानुसार काम करनेवाला मनुष्य गऊके खुरसे जमीनपर बने हुए गड्ढेमें भरे हुए जलकी तरह संसार-रूपी समुद्रको अनायास ही लाँघ सकता है, किन्तु जब कि रहन-सहन कुछ और तरहकी है और कथन कुछ और ही है, तो फिर हे हरे ! आपके चरणोंका आनन्द उसे कैसे मिल सकता है ? ॥२॥ देखनेमें मोर सुन्दर लगता है और ऐसी मंगलमय वाणी बोलता है मानों अमृतसे सनी हुई हो ! किन्तु उसका आहार विषधर सर्प है। वह ऐसा कठोर है । उसकी यह करनी है और वह वाणी ॥३॥ जो समस्त प्राणियोंपर प्रेम करते हैं, जो ईर्ष्या-रहित हैं, जो आपके चरणारविन्दोंके भक्त हैं, जो धीर-बुद्धि हैं, जो विशेष रूपसे अपने-परायेका भाव छोड़ चुके हैं, हे रघुनाथजी ! वे ही साधु आपको प्रिय हैं । हे रघुनाथजी ! यद्यपि मेरे अपार दुर्गुण संसारके ही योग्य हैं, फिर भी हे करुणानिधान ! आप अपने गुणोंपर विचार करके मुझ तुलसीदासपर दया कीजिये ॥५॥ ( ११९ ) हे हरि ! कवन जतन भ्रम भागै । देखत, सुनत, बिचारत यह मन, निज सुभाउ नहिं त्यागै ॥१॥ भगति ग्यान-बैराग्य सकल साधन यहि लागि उपाई । कोउ भल कहउ, देउ कछु, असि बासना न उर ते जाई ॥२॥ जेहि निसि सकल जीव सूतहिं तब कृपा-पात्र जन जागै । निज करनी विपरीत देखि मोहिं समुझि महाभय लागै ॥३॥ जद्यपि भग्न-मगोरथ विधिवस, सुख इच्छत दुख पावै । चित्रकार करहीन जथा स्वारथ बिनु चित्र बनावै ॥४॥

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