विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 223, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें२१२ विनय-पत्रिका 'मैं अपराध-सिंधु करुनाकर ! जानत अंतरजामी । तुलसिदास भव-ब्याल-ग्रसित तब सरन उरग-रिपु-गामी ॥५॥ शब्दार्थ—अर्थ = इन्द्रियोंके विषय । स्वान = कुत्ता । अज = बकरा । खर = गधा । अपारो = बेहद । श्रीखंड = चन्दन । बेनु = बाँस । भावार्थ—हे हरे ! मैं तुम्हें क्या दोष दूँ ? जिस उपायसे स्वप्नमें भी उद्धार होना दुर्लभ है, वही मैं रातदिन किया करता हूँ ॥१॥ मैं जानता हूँ कि इन्द्रियों- के विषय अनर्थरूप हैं, इनके कारण मैं अन्धकूपमें गिर पहूँगा; फिर भी मैं उन्हें न छोड़कर कुत्ते, बकरे और गधेकी भाँति विषयानुरागमें भटक रहा हूँ ॥२॥ सब प्राणियोंसे द्रोह करके और मोहके वशीभूत होकर मैंने अपनी भलाईपर विचार नहीं किया और ज्ञानके शत्रु मद, ईर्ष्या, अभिमान आदिमें बेहद लीन रहने लगा ॥३॥ समस्त संसारमें श्रीरघुनाथजी ही व्याप्त हैं, यह वेदों और पुराणोंमें सुनते और समझते हुए भी, मेरे सारहीन पापी मनमें वह बात ठीक उसी प्रकार नहीं घुस रही है जैसे चन्दनकी सुगन्ध बाँसमें नहीं भिनती ॥४॥ हे करुणाकी खानि श्रीरामजी ! मैं अपराधोंका समुद्र हूँ, इसे आप जानते हैं,— क्योंकि आप अन्तर्यामी हैं। इसलिए हे गरुड़गामी ! संसार-सर्पसे ग्रसित यह तुलसीदास आपकी शरणमें है ॥५॥ ( ११८ ) हे हरि ! कवन जतन सुख मानहुँ । ज्यों गज दसन तथा मम करनी, सब प्रकार तुम जानहु ॥१॥ जो कछु कहिय करिय भवसागर तरिय बच्छपद जैसे । रहनि आन विधि, कहिय आन, हरिपद-सुख पाइय कैसे ॥२॥ देखत चारु मयूर बयन सुभ बोल सुधा इव सानी । सविष उरग-आहार, निठुर अस, यहु करनी वह बानी ॥३॥ अखिल-जीव-वत्सल, निरमत्सर, चरन कमल अनुरागी । ते तव प्रिय रघुवीर धीर मति, अतिसय निज-पर-त्यागी ॥४॥ जद्यपि मम औगुन अपार संसार जोग्य रघुराया । तुलसिदास निज गुन विचारि करुना-निधान करु दाया ॥५॥