विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २११ होता ॥१॥ सुनता हूँ, विचार करता हूँ, समझता हूँ, दूसरोंको समझाता हूँ, फिर भी तुम्हारी उस मायाकी गति मनमें नहीं बैठती, जिसका अनुभव हुए बिना मोह- जनित संसारकी भयंकर विपत्तियाँ सताती रहती हैं ॥२॥ ब्रह्मामृत बड़ा ही मधुर और शीतल है, उसका स्वादु यदि कहीं यह मन पा जाय, तो फिर यह मृगजल- रूप विषयोंके लिए रातदिन क्यों दौड़े ॥३॥ जिसके घरमें स्वच्छ चिन्तामणि है, वह काँच क्यों बटोरने लगा ! भाव यह है कि जिसे भगवान्के रूप-माधुर्यका आनन्द प्राप्त हो जायगा, वह तुच्छ सांसारिक विषयोंकी ओर नहीं झुक सकता । जैसे कोई स्वप्नमें किसीके पराधीन हो जाय, किन्तु जागनेपर वह (छूटनेके लिए) किसीसे विनय करते नहीं देखा जाता ॥४॥ ज्ञान, भक्ति तथा और जो बहुत-से साधन हैं, वे सब सच्चे हैं, झूठा कुछ भी नहीं है, किन्तु तुलसीदासके मनमें यह विश्वास है कि केवल श्रीरामजीकी कृपासे ही भ्रमका नाश हो सकता है ॥५॥ विशेष 'यह माया'—भगवान्की माया कैसी है, इसे भगवान्ने स्वयं ही गीतामें कहा है— 'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥'—श्रीमद्भगवद्गीता श्लोकार्थ—मेरी यह गुणमयी (गुणात्मक) और दिव्य माया दुस्तर है । इस मायाको वे ही पार करते हैं, जो मेरी शरणमें आ जाते हैं । ( ११७ ) हे हरि ! कवन दोष तोहिं दीजै । जेहि उपाय सपनेहुँ दुरलभ गति, सोइ निसि-बासर कीजै ॥१॥ जानत अर्थ अनर्थ-रूप, तमकृप परब येहि लागे । तदपि न तजत स्वान अज खर ज्यों, फिरत विषय अनुरागे ॥२॥ भूत-द्रोह कृत मोह बस्य हित आपन मैं न विचारो । , मद-मत्सर-अभिमान ज्ञान-रिपु, इन महँ रहनि अपारो ॥३॥ वेद-पुरान सुनत समुझत रघुनाथ सकल जगव्यापी । बेधत नहिं श्रीखंड बेनु इव, सारहीन मन पापी ॥४॥