विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ७५ बहु वासना विविध कंचुकि भूषन लोभादि भरथ्यो। चर अरु अचर गगन-जल-थल महँ, कौन न स्वाँग करथ्यो ॥२॥ देव-दनुज, मनि, नाग, मनुज नहिं जाँचत कोउ उबरथ्यो । मेरो दुसह दरिद्र, दोष, दुख काहू तौ न हरथ्यो ॥३॥ थके नयन, पद, पानि, सुमति, बल, संग सकल बिछुरथ्यो । अब रघुनाथ सरन आयो जन, भव-भय बिकल डरथ्यो ॥४॥ जेहि गुन तें वस होहु रीझि करि, सो मोहिं सब विसरथ्यो । तुलसिदास निज भवन-द्वार प्रभु, दीजै रहन परथ्यो ॥५॥ शब्दार्थ—कंचुकि = वस्त्र । चर = चलनेवाले,चैतन्य । अचर = जड़ । गगन = आकाश । स्वाँग = तमाशा । भावार्थ—रातदिन नाचते ही नाचते मरा । हे हरि ! जबसे आपने जीव नाम रख दिया, तभीसे स्थिरता जाती रही ॥१॥ नाना प्रकारके वासनारूपी वस्त्र तथा लोभादि आभूषण धारणकर चर और अचर एवं आकाश, जल और पृथिवीमें ऐसा कौन-सा स्वाँग है जो न किया हो ॥२॥ देवता, दैत्य, मुनि, नाग, मनुष्य आदिमें ऐसा कोई भी नहीं बचा है जिससे मैंने याचना न की हो । किन्तु मेरे दुःसह दारिद्र्य, दोष और दुःखका किसीने भी तो हरण नहीं किया ॥३॥ नेत्र, पैर, हाथ, बुद्धि और बल सब थक गये और सबने मेरा साथ भी छोड़ दिया । अतः हे रघुनाथजी ! अब संसार-भयसे डरकर विकल हुआ यह दास आपकी शरणमें आया है ॥४॥ जिन गुणोंपर आप रीझकर वशमें हुआ करते हैं, उन सबको मैं भूल गया हूँ । हे प्रभो ! अब तुलसीदासको अपने गृहके द्वारपर पड़ा रहने दीजिये—हटाइये नहीं ॥५॥ विशेष १—'जब तँ जिव नाम धर्यो'—यों तो वेदान्तशास्त्रने 'जीव' संज्ञा पड़नेके कई कारण बतलाये हैं, पर उन सबमें अद्वैतवेदान्तका ही मत ग्राह्य है। किन्तु अद्वैतवादमें भी इस विषयमें कई मत हैं—जैसे अवच्छेदवाद, आभास- वाद, प्रतिबिम्बवाद, एक-जीववाद और अनेक जीववाद आदि । प्रत्येक 'वाद' के अनुसार 'जीव'की परिभाषा १३६ वें पदकी टिप्पणीमें दी गयी है। यहाँ