भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 185

१७४ विनय-पत्रिका धूम-समूह निरखि चातक ज्यों, तृषित जानि मति घन की । नहिं तहँ सीतलता न बारि, पुनि हानि होति लोचन की ॥२॥ ज्यों गच-काँच बिलोकि सेन जड़ छाँह आपने तन की । टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की ॥३॥ कहँ लौं कहौं कुचाल कृपानिधि ! जानत हौ गति जन की । तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पन की ॥४॥ शब्दार्थ—गच = भूमि, दीवार, फर्श । सेन = बाजपक्षी; 'सेन' शब्द 'श्येन' का अपभ्रंश है । आनन = मुख । पन = प्रतिज्ञा । भावार्थ—इस मनकी ऐसी मूढ़ता है कि यह श्रीराम-भक्ति-रूपी देवनदी- (गंगा) को त्यागकर ओस-कणकी आशा करता है ॥१॥ जैसे प्यासा पपीहा धुएँके समूहको देखकर उसे मेघ समझ लेता है, किन्तु निकट जानेपर न तो उसे शीतलता मिलती है और न जल ही, उलटा उसे नेत्रोंसे हाथ धो बैठना पड़ता है ॥२॥ जैसे बाज पक्षी शीशेकी दीवारमें अपने शरीरकी निर्जीव छाया देखकर आहारके लिए विशेष आतुर होनेके कारण अपने मुँहकी दशा भूलकर उसपर टूट पड़ता है, परिणाम यह होता है कि उसीका मुँह घायल हो जाता है ॥३॥ हे कृपानिधान ! मैं इस मनकी कुचाल कहाँतक कहूँ, आप तो इस दासकी दशा जानते ही हैं। हे प्रभो ! तुलसीदासका असह्य दुःख दूर करके अपने प्रणकी लाज रखिये ॥४॥ [ ९१ ] नाचत ही निसि-दिवस मरयो । तबही तें न भयो हरि थिर जब तें जिव नाम धरयो ॥१॥ धूमपटलमवलोक्य चातको, बुध्वा यथाभ्रमलसः । लभते तत्र न शीतलम्मभो, दृग्वैरिणं च वयसः ॥ श्येनः कांचकुट्टिमे दृष्ट्वा, तं विम्बमतिरभसः । पतित तत्र परपतन्निरूपे, हानिमुपैति च वचसः ॥ मनसः किं वर्णये जडत्वं, करुणानिधे कुशशयः । कृत्वाऽत्म पणत्रपां जनस्यापहर दुःखमतितपसः ॥