विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहौं हारयो करि जतन विविध बिधि अतिसै प्रवल अजै। तुलसिदास वस होइ तवहिं, जब प्रेरक प्रभु वरजै ॥४॥ शब्दार्थ—निजै = अपने ही। अनुभवति = अनुभव करती है। अनुकूल = प्रसन्न। गृहपसु = कुत्ता। पदत्रान = जूता। बरजै = मना करें, रोकें। भावार्थ—हे प्रभो ! मेरा मन हठ नहीं छोड़ता। हे नाथ ! मैं उसे रातदिन अनेक प्रकारसे शिक्षा देता हूँ, पर यह अपने ही स्वभावानुसार काम करता है ॥१॥ जैसे युवती स्त्री संतान जननेके समय अत्यन्त असह्य कष्टका अनुभव करती है, पर अनुकूल (प्रसव-वेदनासे छुटकारा पाते ही प्रसन्न) होकर वह मूर्खा सारे दुःखोंको भूलकर फिर दुष्ट पतिको भजने लगती है ॥२॥ जैसे लालची कुत्ता घूमता हुआ जहाँ जाता है, वहीं उसके सिरपर जूते पड़ते हैं, फिर भी वह नीच उसी मार्गपर विचरण करता है, इसमें वह मूढ़ कभी भी लज्जित नहीं होता ॥३॥ मैं अनेक प्रकारके यत्न करके हार गया, (पर यह मन) अत्यन्त प्रबल और अजेय है। तुलसीदास कहते हैं कि यह मन तभी वशमें हो सकता है, जब जगत्के प्रेरक भगवान् इसे रोकें ॥४॥ विशेष १—'अतिसै प्रबल अजै'—गीतामें अर्जुनने भगवान्से कहा है— चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनकी बातका समर्थन इस प्रकार किया है— असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । ९० ] ऐसी मूढ़ता या मनकी।¹ परिहरि राम-भगति-सुरसरिता, आस करत ओसकन की ॥१॥ १. महामहोपाध्याय पं० सुधाकरजी द्विवेदीका रचा हुआ संस्कृत अनुवाद इस प्रकार है— एतादृशी मूढ़ता मनसः । रामभक्तिसुरसरितं हित्वा, वांछति कणं कुपयसः ॥