भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 183

१७२ विनय-पत्रिका निज हित नाथ पिता गुरु हरिसों हरषि हृदै नहिं आन्यो। तुलसिदास कव तृषा जाय सर खनतहि जनम सिरान्यो ॥४॥ शब्दार्थ—सहज सुख = आत्मानन्द । सान्यो = सान रखा है। आन्यो = लाना, धारण नहीं किया। तृषा = प्यास । सिरान्यो = बीत गया। भावार्थ—रे मन ! तूने कभी विश्राम न माना। (तू) आत्मानन्दको भूल- कर रातदिन घूमता रहता है और (तुझे) इन्द्रियाँ इधर-उधर खींचकर ले जाती हैं ॥१॥ यद्यपि विषयोंके साथ तूने दुःसह दुःख सहन किये हैं और कठिन जालमें फँसा हुआ है, तथापि रे मूढ़ ! तू उसे नहीं छोड़ रहा है और ममताके कारण जान लेनेपर भी उसे नहीं जाना ॥२॥ अनेक जन्मोंमें नाना प्रकारके कर्म करके तू ने उन्हीं (कर्मों)के कीचड़में चित्तको सान रखा है। किन्तु विवेक-रूपी जलके बिना तू निर्मल नहीं हो सकता, ऐसा वेदों और पुराणोंने कहा है ॥३॥ अपनी भलाई स्वामी रूप, पितारूप और गुरुरूप प्रभुजीसे है, किन्तु तूने हर्षित होकर अपने हृदयमें उन्हें धारण नहीं किया । तुलसीदास कहते हैं कि जिस तालाबको खोदनेमें ही जीवन बीत गया, उस तालाबसे भला प्यास कब बुझ सकती है ॥६॥ विशेष १—'निज हित……आन्यो'—का अर्थ वियोगी हरिजीने लिखा है, “जैसा प्रेम अपने मित्र, स्वामी, पिता और गुरुके साथ किया जाता है, वैसा तूने प्रसन्न होकर कभी हृदयसे भगवान्‌के साथ नहीं किया।” किन्तु गोस्वामी- जी के शब्दोंसे यह अर्थ नहीं निकलता । [ ८९ ] मेरो मन हरि जू ! हठ न तजै। निसि-दिन नाथ देउँ सिख बहु-विधि, करत सुभाउ निजै ॥१॥ ज्यों जुवती अनुभवति प्रसव अति दारुन दुख उपजै । ह्वै अनुकूल बिसारि सूल सठ पुनि खल पतिहिं भजै ॥२॥ लोलुप भ्रमत गृहपसु ज्यों जहँ तहँ सिर पदत्रान बजै । तदपि अधम बिचरत तेहि मारग कबहुँ न मूढ़ लजै ॥३॥