भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 182

विनय-पत्रिका १७१ यद्यपि गंगाजी अत्यन्त पवित्र हैं, तीनों लोकोंमें उनकी कीर्त्ति छा रही है, पर भगवान्के चरणोंसे अलग होनेके कारण अबतक उनका भी नितका बहना बन्द नहीं हुआ ॥३॥ वेदोंने यह सन्देह दूर कर दिया है कि श्रीरामजीका भजन किये बिना विपत्तियाँ नहीं छूट सकतीं । हे तुलसीदास ! अब सारी आशाओंको छोड़- कर तू श्रीरामजीका दास हो जा ॥४॥ विशेष १- 'ससि-रवि मन-नैननि तें'- चन्द्रमाकी उत्पत्ति भगवान्के मनसे हुई है और सूर्यकी उत्पत्ति उनके नेत्रोंसे । पुरुषसूक्तमें लिखा भी है:- 'चन्द्रमा मनसो जातः चक्षोः सूर्यो अजायत' । २- 'रिपु राहु' - समुद्र-मन्थनके बाद जब देवता और दैत्य अमृतके लिए आपसमें लड़ने लगे, तब भगवान्ने मोहिनीरूप धारण करके अमृतका घड़ा अपने हाथमें लेकर एक पंक्तिमें देवताओं और दूसरी पंक्तिमें दैत्योंको बिठाकर देवताओंकी पंक्तिसे उसे बाँटना शुरू किया । उस समय दैत्य उनके रूपपर मोहित हो गये थे । राहु नामक दैत्य भगवान्‌का कपट समझकर सूर्य और चन्द्रमाके बीचमें जा बैठा और धोखेसे उसे भी अमृत दिया गया । पश्चात् जब भगवान्‌को यह बात सूर्य और चन्द्रमाके इशारा करनेपर मालूम हुई, तब उन्होंने चक्रसे उसका सिर काट दिया । किन्तु वह अमृत पान कर चुका था, अतः मरा नहीं और मुण्डका राहु हो गया और धड़का केतु । बस राहु उसी वैरसे ग्रहणके समय सूर्य और चन्द्रमाको दुःख देता है । ( ८८ ) कबहुँ मन विश्राम न मान्यो । निसिदिन भ्रमत बिसारि सहज सुख, जहँ तहँ इंद्रिन तान्यो ॥१॥ जदपि विषय-सँग सह्यो दुसह दुख, विषम जाल अरुझान्यो । तदपि न तजत मूढ़, ममताबस जानत हूँ नहिं जान्यो ॥२॥ जनम अनेक किये नाना बिधि, करम-कीच चित सान्यो । होइ न विमल विवेक-नीर-बिनु, वेद पुरान बखान्यो ॥३॥