विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० विनय-पत्रिका का ध्यान किये बिना कहीं भी ठौर नहीं है ॥१॥ जिनके चरणोंकी सेवा करके ब्रह्मा और शिवने भी सिद्धि प्राप्त की है, शुक-सनकादि जीवन्मुक्त होकर विचरण कर रहे हैं और अब भी वे उनका भजन करते जा रहे हैं ॥२॥ यद्यपि लक्ष्मीजी सदासे परम चंचला हैं, कहीं भी स्थिर नहीं रहतीं, तथापि वह भगवच्चरणार- विन्दको पाकर मन-वचन-कर्मसे अचल हो गयीं ॥३॥ (दासता बुरी चीज है, पर) करुणा-सागर, भक्त-चिन्तामणि भगवान् रामचन्द्रजीकी सेवा करनेमें भी शोभा है और जितने देवता तथा दैत्योंके स्वामी हैं, सबको षट् ऊर्मी शोक, मोह, क्षुधा, पिपासा, जरा, मरण इन छ साँपोंने डँस लिया है ॥४॥ हे पुत्र ! (तुम्हारी विमाता) सुरुचिने जो तुमसे कहा है (कि पहले तप करो), वह यद्यपि अत्यन्त कठोर वचन है फिर भी सत्य है। अतः हे तुलसीदास ! श्रीरघुनाथजीसे विमुख रहनेपर विपत्तियोंका नाश कभी नहीं होता ॥५॥ ८७ सुनु मन मूढ़ सिखावन मेरो। हरि-पद-विमुख लह्यो न काहु सुख, सठ ! यह समुझ सबेरो ॥१॥ बिछुरे ससि-रवि मन-नैननि तें, पावत दुख बहुतेरो। भ्रमत भ्रमित निसि-दिवस गगन महँ, तहँ रिपु राहु बड़ेरो ॥२॥ जद्यपि अति पुनीत सुरसरिता, तिहुँ पुर सुजस घनेरो। तजे चरन अजहूँ न मिटत नित, बहियो ताहू केरो ॥३॥ छुटै न विपति भजे बिनु रघुपति, श्रुति संदेह निबेरो। तुलसिदास अब आस छाँड़ि करि, होहु राम को चेरो ॥४॥ शब्दार्थ—सवेरो = शीघ्र, समय रहते । सुरसरिता = गंगा । घनेरो = बहुतसे । निबेरो = दूर कर दिया है। भावार्थ—रे मूढ़ मन ! मेरी शिक्षा सुन । भगवान्के चरणोंसे विमुख रहकर किसीको सुख नहीं प्राप्त हुआ । रे दुष्ट ! इस बातको समय रहते ही समझ ले ॥१॥ भगवान्के मनसे चन्द्रमा और नेत्रोंसे सूर्य अलग होनेके कारण ही (चन्द्रमा और सूर्य) भारी दुःख पा रहे हैं। वे रात-दिन आकाशमें थके हुए घूमते रहते हैं और वहाँ उनका बड़ा शत्रु राहु मौजूद है ॥२॥