विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १६९ विशेष १ 'सुंदर परम उदारहिं'—में 'परम' शब्द 'देहरी दीपक' है। जो शब्द ड्योढ़ीके दीपककी भाँति अपनेसे पूर्व और पर दोनों शब्दोंके साथ लगता है उसे 'देहरी दीपक' कहते हैं। जैसे ड्योढ़ीका दीपक भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश करता है, उसी प्रकार यह शब्द दोनों ओर लगता है। [ ८६ ] इहै कह्यो सुत ! वेद चहूँ । श्रीरघुवीर-चरन-चिंतन तजि नाहिंन ठौर कहूँ ॥१॥ जाके चरन विरंचि सेइ सिधि पाई संकर हूँ । सुक-सनकादि मुकुत बिचरत तेउ भजन करत अजहूँ ॥२॥ जद्यपि परम चपल श्री संतत, थिर न रहति कतहूँ । हरि-पद-पंकज पाइ अचल भइ, करम-वचन-मन हूँ ॥३॥ करुनासिंधु, भगत—चिंतामनि, सोभा सेवत हूँ । और सकल सुर, असुर-ईस सब खाये उरग छहूँ ॥४॥ सुरुचि कह्यो सोइ सत्य तात अति परुष वचन जवहूँ । तुलसिदास रघुनाथ-विमुख नहिं मिटइ विपति कवहूँ ॥५॥ शब्दार्थ—विरंचि = ब्रह्मा । श्री = लक्ष्मी । संतत = सदा । सुर = देवता । उरग = (उर+ग) छातीके बल गमन करनेवाला, सर्प । तात = पुत्र । परुष = कठोर । प्रसंग—महाराज उत्तानपादकी दो रानियाँ थीं—सुनीति और सुरुचि । सुनीतिके पुत्र ध्रुव थे और सुरुचिके उत्तम । राजाका स्नेह छोटी रानीपर अधिक था । एक दिन राजा अपने पुत्र उत्तमको गोदमें लिये बैठे थे, उसी समय ध्रुव वहाँ आकर उनकी गोदमें बैठने लगे । विमाताने उनसे कड़े शब्दोंमें कहा, पहले तप करके राजाकी गोदमें बैठनेके अधिकारी बनो, पीछे गोदमें बैठनेका साहस करना । यह सुनकर ध्रुव रोते हुए अपनी माता सुनीतिके पास लौट आये । सारा हाल सुननेके बाद ध्रुवकी माता सुनीतिने उन्हें जो उपदेश दिया, उसीके प्रसंगमें यह पद बनाया गया है । भावार्थ—हे पुत्र (ध्रुव) ! चारों वेदोंने यही कहा है कि श्रीरामजीके चरणों-