भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 179

१६८ विनय-पत्रिका श्रमरुपी फल हाथ लगता है। यह सोचकर तू कुमार्ग और कुसंगको छोड़कर सज्जनोंके साथ मिलकर सुमार्गपर चल एवं ॥२॥ राम-भक्तोंके दर्शन कर और उनके मुखसे भगवान्‌की कीर्त्ति सुनकर नामको रट—रामकी गुण-गाथाओंका गान कर। हाथमें धनुष-बाण लिये मुनियोंके वस्त्र धारण किये तथा कमरमें तरकस कसे हुए प्रभुका अपने हृदयमें ध्यान कर ॥३॥ हे तुलसीदास ! तू सब प्रपंचोंको छोड़कर श्रीरामजीके चरणारविन्दोंपर मस्तक झुका। तू डर न, तेरे जैसे बहुत-से खलोंको जानकी-वल्लभ श्री रघुनाथजी अपना चुके हैं ॥४॥ राग-धनाश्री [ ८५ ] मन ! माधव को नेकु निहारहि । सुनु सठ, सदा रंक के धन ज्यों, छिन छिन प्रभुहि सँभारहि ॥१॥ सोभा-सील-ग्यान-गुन-मंदिर, सुंदर परम उदारहि । रंजन संत, अखिल अघ-गंजन, भंजन विषय-विकारहि ॥२॥ जो बिनु जोग-जग्ग-ब्रत-संजम गयो चहै भव पारहि । तौ जनि तुलसिदास निसि-बासर हरि-पद-कमल बिसारहि ॥३॥ शब्दार्थ—नेकु = जरा, तनिक। रंजन = प्रसन्न करनेवाले। अघ = पाप। गंजन = नाशकर्ता। भावार्थ—रे मन ! भगवान् माधवकी ओर तनिक देख। रे शठ ! सुन, जैसे कंगाल सदैव अपने धनकी सँभाल किया करता है, उसी प्रकार तू प्रतिक्षण परमात्माको सँभालनेमें लगा रह ॥१॥ (किस परमात्माको सँभालनेमें यह मन लगा रहे ?) परम सुन्दर और उदार (दानी) परमात्माको। वह परमात्मा शोभा, शील, ज्ञान और गुणोंके घर हैं। वह संत-जनोंको प्रसन्न करनेवाले, सम्पूर्ण पापोंको नाश करनेवाले तथा विषय-विकारको दूर करनेवाले हैं ॥२॥ यदि तू बिना योग, यज्ञ, व्रत और संयमके ही संसार-सागरसे पार होना चाहता है, तो ऐ तुलसीदास ! रातदिन भगवान्‌के चरणारविन्दोंको न भूल, अर्थात् रात- दिन उनके चरणारविन्दोंका स्मरण किया कर ॥३॥