भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 165

१५४ विनय-पत्रिका तुलसी जागे ते जाय ताप तिहूँ ताय रे । राम-नाम सुचि रुचि सहज सुभाय रे ॥४॥ शब्दार्थ—नेह = स्नेह । दामिनी = बिजली । संसृति = संसार । बुध = पण्डित । भावार्थ—ऐ जड़ जीव ! जाग, जाग; और संसाररूपी रात्रिको देख; अर्थात् सांसारिक अविद्या या मोहको समझ । यह जान ले कि देह और घरका स्नेह मानो बादलोंके बीचकी बिजली है (जो जरा-सी देरके लिए कौंधकर गायब हो जाती है) । (यदि तू यह समझता हो कि जागनेपर कष्टका ही अनुभव होगा तो ) जो आदमी सो जाता है, वह स्वप्नमें ही मृगजालमें डूबा, रस्सीके साँपसे डस लिया, इस प्रकार संसारका सन्ताप सहता है ॥२॥ चारों वेदों और पंडितोंका कथन है और तू भी अपने मनमें समझ ले कि स्वप्नके दोष और दुःख जागनेपर ही दूर होते हैं ॥३॥ तुलसीदास कहते हैं कि दैहिक, दैविक और भौतिक इन तीनों तापोंके दुःख जागनेपर ही जाते हैं और तभी राम-नाममें पवित्र प्रीति सहज स्वभावसे उत्पन्न होती है ॥४॥ विशेष १—‘जागु जागु’ इस विषयमें गोस्वामीजीने रामचरितमानसमें कहा है:— ‘इहि जग जामिनि जागहिं जोगी । परमारथ एरपंच वियोगी ॥ २—‘मृगजाल’—यहाँ पुत्र, कलत्र, धन आदि ही मृगजल है । राग-विभास [ ७४ ] जानकीस की कृपा जगावती सुजान जीव, जागि त्यागि मूढ़ताऽनुरागु श्रीहरे । करि विचार, तजि विकार, भजु उदार रामचंद्र- भद्रसिंधु, दीनबंधु, वेद वदत रे ॥१॥ मोहमय कुहू-निसा विसाल काल विपुल सोयो, खोयो सो अनूप रूप स्वप्न जो परे ।