भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 167

१५६ विनय-पत्रिका विशेष १—'विसाल काल···सोयो'—संसारमें कर्मानुसार अनन्त बार जन्म लेना और मरना ही सोना है । २—'खोयो'—कहा भी है, 'जो सोया सो खोया, जो जागा सो पाया' । राग-ललित ( ७५ ) खोटो खरो रावरो हौं, रावरे सों झूठ क्यों कहौंगो, जानौ सबही के मनकी । करम-वचन-हिये, कहौं न कपट किये, ऐसी हठ जैसी गाँठि, पानी परे सनकी ॥१॥ दूसरो भरोसो नाहिं, वासना उपासना की, वासव, विरंचि सुर-नर-मुनिगन की । स्वारथ के साथी मेरे हाथी खान लेवा देई, काहू तो न पीर रघुबीर ! दीन जन की ॥२॥ साँप-सभा साबरैं लबार भये, देव दिव्य, दुसह साँसति कीजै आगे ही या तन की । साँचे परौं पाऊँ पान, पंचमें पन प्रमान, तुलसी चातक आस राम स्यामघन की ॥३॥ शब्दार्थ—खोटो = बुरा । खरो = भला । रावरो = आपका । वासव = इन्द्र । लेवा देई = लेन-देन । तो = तुम्हारे सदृश । साबर = एक मंत्रका नाम है । लबार = झूठा । भावार्थ—मैं बुरा हूँ तो भी आपका हूँ और भला हूँ तो भी आपका ही । भला मैं आपसे झूठ क्यों कहूँगा ? क्योंकि आप प्रत्येक प्राणीके दिलकी बात जानते हैं । इसे मैं निष्कपट होकर मन, वचन और कर्मसे कहता हूँ । मेरे हठकी ठीक वही दशा है जैसे पानी पड़नेपर सनकी गाँठकी । न तो मुझे दूसरा कोई सहारा है और न इन्द्र, ब्रह्मा, देवता, मनुष्य तथा मुनियोंकी उपासना करनेकी इच्छा है । ये सब मतलबके यार हैं, हाथीसे कुत्तेकी लेन-देन करनेवाले हैं—