भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 172

विनय-पत्रिका १६१ भावार्थ—हे श्रीरामजी ! दीनोंके लिए दयालु दानी (आपके सिवा) दूसरा कोई नहीं है। मैं जिसे अपनी दीनता सुनाता हूँ, वह (स्वयं ही) दीन नजर आता है ॥१॥ यों तो देवता, मनुष्य, मुनि, दैत्य, नाग आदि बहुत-से मालिक हैं, पर ये सब तभीतक हैं, जबतक आपकी दृष्टि जरा भी टेढ़ी नहीं होती ॥२॥ तीनों लोक और तीनों कालमें यही प्रसिद्ध है तथा चारों वेद भी कह रहे हैं कि हे राम ! आदि, अन्त और मध्यमें (केवल) आपकी ही साहबी है ॥३॥ आपसे माँगनेके बाद कोई भी भिक्षुक फिर मंगन नहीं रह गया। आपका यही स्वभाव, शील और सुयश सुनकर यह दास माँगने आया है ॥४॥ आपने पाषाण (अहल्या), पशु (वानर-भालू), वृक्ष (यमलार्जुन) और पक्षी (जटायु, काक- भुशुंडि आदि) तकको अपना लिया है। हे महाराज दशरथके पुत्र ! आपने दरिद्रोंको राजा बना दिया है ॥५॥ आप गरीबोंको निहाल करनेवाले हैं, और मैं आपका गरीब दास हूँ। हे कृपालु ! एक बार कह दीजिये कि तुलसीदास मेरा है ॥६॥ विशेष १—'विटप'—एक बार कुबेरके पुत्र नलकुबर और मणिग्रीवके मजाक उड़ानेपर नारदजीने उन्हें वृक्ष हो जानेके लिए शाप दे दिया था। अन्तमें उनके प्रार्थना करनेपर नारदजीने कह दिया था कि भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंके स्पर्शसे तुम्हारा उद्धार हो जायगा। वे दोनों भाई नारदके शापसे गोकुलमें अर्जुन वृक्ष बन गये। एक दिन यशोदाजीने किसी अपराधके कारण बालक श्रीकृष्णको ऊखलमें बाँध दिया। भगवान् धीरे-धीरे उन जुड़े हुए पेड़ोंके पास पहुँचे और ऊखलको दोनों वृक्षोंके बीचमें फँसाकर ऐसा झटका दिया कि दोनों पेड़ गिर पड़े। इस प्रकार वे दोनों वृक्ष-योनि छोड़कर यक्ष हो गये और भगवान्‌की स्तुति करने लगे। परमात्माने उन्हें मुक्त कर दिया। २—विहंग—(जटायु) ४३ वें पदके विशेषमें देखिये। ( ७९ ) देव— तू दयालु, दीन हों, तू दानि, हों भिखारी। हों प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज-हारी ॥१॥ १०