विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० विनय-पत्रिका के निवासस्थान हैं। सहज (बिना बनावट-सजावटके) ही आपके सुन्दर शरीर- की शोभा अगणित कामदेवोंके समान है ॥१॥ आप जगत्के पिता, माता, गुरु, हितू, मित्र, सबपर अनुकूल रहनेवाले, दीनबन्धु तथा किसीके भी प्रतिकूल न रहनेवाले हैं। आप दुःखोंके हरनेवाले, (शरणागतोंको) शरण देनेवाले, अमित- दानी, भक्तोंका पालन करनेवाले और कृपालु हैं। आपका नाम पापियोंको पवित्र करनेवाला है ॥२॥ विश्व-ब्रह्माण्ड आपकी वन्दना करता है, समस्त देवता आपकी सेवा करते हैं तथा वेद और शास्त्र आपकी ही गुणावली गाते हैं ! यही सब जानकर तुलसीदास आपका सेवक हुआ है; आप इसे (तुलसीदासको) अलग गिनेंगे या गरीब गुलामोंमें गिनेंगे ? ॥३॥ राग तोड़ी ( ७८ ) देव— दीन को दयालु दानि दूसरो न कोऊ । जाहि दीनता कहौं हौं देखौं दीन सोऊ ॥१॥ सुर, नर, मुनि, असुर, नाग साहिब तौ घनेरे । पै तौ लों जौ लों रावरे न नेकु नयन फेरे ॥२॥ त्रिभुवन, तिहुँकाल विदित, वेद वदति चारी । आदि-अंत-मध्य राम ! साहिबी तिहारी ॥३॥ तोहि माँगि माँगनौ न माँगनो कहायो । सुनि सुभाव-सील-सुजसु जाचन जन आयो ॥४॥ पाहन-पसु, विटप-विहँग अपने करि लीन्हे । महाराज दसरथ के ! रंक राय कीन्हे ॥५॥ तू गरीब को निवाज, हौं गरीब तेरो । बारक कहिये कृपालु ! तुलसिदास मेरो ॥६॥ शब्दार्थ—हौं = मै । घनेरे = बहुतेरे । लौ = तक । कहति = कहते हैं । पाहन = पत्थर, यहाँ यह शब्द अहिल्याके अर्थमें है । विटप = पेड़, (यमलार्जुन) । विहँग = पक्षी (गीध जटायु और काकभुशुंडि) । रंक = भिखारी । राय = राजा । बारक = एक बार ।