विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ विनय-पत्रिका नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसों ? मो समान आरत नहिं, आरतिहर तोसों ॥२॥ ब्रह्म तू, हौं जीव, तू है ठाकुर, हौं चेरो । तात-मातु, गुरु-सखा तू सब बिधि हितु मेरो ॥३॥ तोहिं मोहिं नाते अनेक, मानिये जो भावै । ज्यों त्यों तुलसी कृपालु ! चरन-सरन पावै ॥४॥ शब्दार्थ—पातकी = पापी । आरत = दुखी । आरतिहर = पीड़ाको हरनेवाला । ठाकुर = स्वामी । चेरो = दास, सेवक । तात = पिता । नाते = सम्बन्ध । भावार्थ—हे प्रभो ! तुम दयालु हो, और मैं दीन हूँ । तुम दानी हो और मैं भिखारी हूँ । मैं प्रसिद्ध पापी हूँ, और तुम पाप-समूहका नाश करनेवाले हो ॥१॥ तुम अनाथोंके नाथ हो, और मेरे जैसा अनाथ कोई भी नहीं है । न तो मेरे समान कोई दुखिया है, और न तुम्हारे जैसा कोई दुःखका हरनेवाला ही है ॥२॥ तुम साक्षात् ब्रह्म हो, और मैं जीव हूँ । तुम स्वामी हो, मैं सेवक हूँ । तुम्हीं मेरे पिता, माता, गुरु, सखा तथा सब प्रकारसे हितकारी हो ॥३॥ तुम्हारे और मेरे बीच बहुत-से नाते हैं, उनमें जो रुचे उसे मान लो । हे कृपालु ! किसी तरह भी हो, तुलसीदासको तुम्हारे चरणोंकी शरण मिलनी चाहिये ॥४॥ विशेष १—'तोहि मोहि नाते अनेक'—कविने ऊपर कई नाते गिना दिये हैं; जैसे—तुम दयालु हो और मैं दीन हूँ; अर्थात् दयालुको दीनोंकी ही आवश्यकता रहा करती है । यदि दीन ही न हों तो आप दयालुता किसपर दिखायेंगे ? इसी प्रकार दीनको भी दयालुकी आवश्यकता रहती है । [ ८० ] दंद— और काहि माँगिये, को माँगिवो निवारै । अभिमतदातार कौन, दुख दरिद्र दारै ॥१॥ धरमधाम राम काम-कोटि-रूप रूरो । साहब सब बिधि सुजान, दान-खड्ग-सूरो ॥२॥