भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 14

विनय-पत्रिका ३ शिव-रूप तथा शामके वक्त विष्णु-रूप रहते हैं। इसीसे गोस्वामीजीने उन्हें 'हरि-संकर-विधि-मूरति' कहा है। शिव-स्तुति ( ३ ) को जाँचिये सम्भु तजि आन दीनदयालु भगत-आरति-हर, सब प्रकार समरथ भगवान ॥१॥ कालकूट-जुर-जरत सुरासुर, निज प्रन लागि किये विष-पान। दारुन दनुज जगत-दुखदायक, मारेउ त्रिपुर एक ही वान ॥२॥ जो गति अगम महामुनि दुर्लभ, कहत सन्त, श्रुति, सकल पुरान । सो गति मरनकाल अपने पुर, देत सदासिव सबहिं समान ॥३॥ सेवत सुलभ, उदार कलपतरु, पारवती-पति परम सुजान । देहु काम-रिपु राम-चरन रति, तुलसिदास कहँ कृपानिधान ॥४॥ शब्दार्थ—आन = दूसरा, और कोई। आरति = कष्ट । भगवान् = ऐश्वर्यवान् । काल- कूट = हलाहल विष । जुर = ज्वाला, ज्वर, ताप । कामरिपु = शिवजी । भावार्थ—शिवजीको छोड़कर और किससे याचना की जाय ? आप दीनों- पर दया करनेवाले, भक्तोंका कष्ट हरण करनेवाले, हर तरहसे समर्थ और ऐश्वर्य- वान् हैं ॥१॥ समुद्र-मंथनके बाद जब हलाहल विषकी ज्वालासे देवता और असुर जलने लगे, तब आप अपनी दीन-दयालुताका प्रण निभानेके लिए उस विषको पान कर गये । संसारको दुःख देनेवाले भयंकर दानव त्रिपुरासुरको आपने एक ही बाणमें मार डाला था ॥२॥ सन्त, वेद और सब पुराण कहते हैं कि जिस गतिकी प्राप्ति महामुनियोंके लिए अगम और दुर्लभ है, वही गति या मुक्ति आप अपने पुरमें अर्थात् काशीमें मृत्युके समय सदैव सबको समभावसे दिया करते हैं ॥ ३ ॥ सेवा करनेमें आप सुलभ हैं यानी सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं। हे पार्वतीके पति ! हे परमज्ञानी ! आप कल्पवृक्षके समान उदार हैं। हे कामदेवको भस्म करनेवाले ! हे कृपानिधान ! तुलसीदासको श्रीरामजीके चरणोंमें भक्ति दे दीजिये।