भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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वास्तवमें काव्य व्याख्या या परिभाषाका विषय नहीं, उसका सच्चा आनन्द तो केवल उसके रसास्वादन द्वारा ही लिया जा सकता है; क्योंकि काव्यकी व्याख्या ही है 'रसात्मकं वाक्यं काव्यम्' । जब कविके अन्तस्तलमें भावनाओं, कल्पनाओं और अनुभूतियोंकी सच्ची छाप पड़ती है, तो उसके हृदयस्थ भाव काव्यके रूपमें स्वतः बहिर्गत होने लगते हैं। उनमें जीवनके जटिल रहस्योंका एक ऐसा मार्मिक उद्घाटन होता है जो काव्य-रसिकोंको एकबारगी तन्मनस्क कर देता है। ऐसा काव्यानन्द लेते समय सुरसिक और सच्चे प्रेमी जनोंकी वास्तवमें 'गिरा अनयन नयन बिनु बानी' वाली हालत हो जाती है। फिर उसकी परिभाषा कैसे सम्भव है ? उसके लिए तो केवल हार्दिक सरसता और गम्भीरता ही चाहिये । काव्य कविकी अन्तरात्माकी पुकार है, उसके जीवनकी कमनीय अनुभूतियोंका जीता-जागता इतिहास है, उसकी हृत्तन्त्रीकी झंकार है, जिससे प्रकृतिका रोम-रोम चिर-मुखरित है । कविकी अमर वाणीमें वह संगीत निहित है, जो हमारी अनुरागात्मिका वृत्तिका सम्बन्ध नैसर्गिक जगत्के कण- कणसे जोड़ना चाहता है। वास्तवमें काव्य कविकी मनोरम भावनाओंका साकार स्वरूप है । ऐसी दशामें यह बात स्वतः सिद्ध हो जाती है कि किसी भी कविके काव्य- मय भावोंको वे ही पाठक समझ सकते हैं जिनका भाव उस कविके भावोंका चुम्बन करता हुआ अत्यन्त शान्त और गम्भीर गतिसे क्रमशः आगे बढ़ता जाता है। स्पष्ट शब्दोंमें यों कह सकते हैं कि किसी कविके काव्यमय भावोंको समझनेके लिए अधिक नहीं तो कमसे कम उस कविके समान पाठकका भी भावुक होना नितान्त आवश्यक है— भले ही पाण्डित्य वैसा न हो । यही कारण है कि हम उच्च कवियोंकी दूरकी उड़ानतक नहीं पहुँच पाते और नीचे ही डैने फड़फड़ाते रह जाते हैं। ठीक यही बात भक्त-भ्रमरोंके लिए अपने कृति कुंजमें भाव-कंज-कलिकाओंमें