विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २ )
भक्ति-मकरन्द प्रस्त्रावित करनेवाले हिन्दीके अमर कवि-कुल-चूड़ामणि गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज-रचित 'विनय-पत्रिका' के सम्बन्धमें कही जा सकती है । उक्त ग्रन्थ गोस्वामीजीकी बुद्धिकी परिपक्वावस्थाका रचा हुआ कहा जाता है । इसके अधिकांश पद इतने गहन और गम्भीर हैं कि मनन ही करते बनता है। आचार्य पं० रामचन्द्र शुक्लने ठीक ही लिखा है कि--भक्ति रसका पूर्ण परिपाक जैसा विनय-पत्रिकामें है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं। इसमें प्रगाढ़ प्रेम, आलम्बनके महत्त्व और अपने दैन्यके अनुभवका ऐसा स्वच्छ शब्द-स्रोत निकला है कि उसमें अवगाहन करनेसे हृदय स्वाभाविक ही निर्मल हो जाता है । अनन्त शक्ति, शील और सौन्दर्यपर आकृष्ट होकर भक्त ज्यों-ज्यों भगवान्के महत्त्वका सान्निध्य प्राप्त करता जाता है त्यों-त्यों उसके भाव महत्त्वकी ओर बढ़ते जाते हैं और महत्त्व भी उसके निकट आने लगता है; अन्तमें लघुत्त्वका महत्त्वमें लय हो जाता है । महत्त्वकी अनुभूतिसे ही भक्तको प्रभुके महत्त्वके सामने अपने दैन्य अर्थात् लघुत्वका अनुभव होने लगता है। यही कारण है कि वह जिस प्रकार भगवान्का महत्त्व वर्णन करनेमें गद्गद होता है, उसी प्रकार उससे अपनी लघुताका वर्णन किये बिना भी रहा नहीं जाता । यह उस अनन्त शक्तिका प्रभाव है कि उसके समक्ष भक्तको अपनी तुच्छताका स्पष्ट चित्र दिखाई पड़ने लगता है। इस अवस्थाके पद इस ग्रन्थमें भरे पड़े हैं। उनमें यथार्थतः बनावट नहीं, सत्यता है । इस ग्रन्थकी क्लिष्टताके सम्बन्धमें संसारके प्रसिद्ध विदेशी विद्वान् डाक्टर सर जी० ए० ग्रियर्सनने भी कहा है:--"विनय-पत्रिका कविके स्तुत्य ग्रन्थोंमेंसे एक है, पर भाषाकी क्लिष्टताके कारण बहुतसे पढ़नेवाले इसको पढ़नेका साहस नहीं करते।" इस ग्रन्थके बहुतसे पदोंका तो ठीक-ठीक अर्थ लिखनेके लिए शब्द ही नहीं मिलते। इसीसे यह बात सर्वमान्य है कि मनोगत भावोंको व्यक्त करनेकी शक्ति शब्दोंमें नहीं है। यहाँपर स्वाभाविक ही यह प्रश्न उठ सकता है कि जब कविके काव्यगत भाव शब्दों द्वारा व्यक्त किये ही नहीं जा सकते, तो फिर काव्य-ग्रन्थोंपर टीका लिखनेकी क्या आवश्यकता ? बात यह है कि टीका सब भावोंको ठीक-ठीक व्यक्त करनेमें असमर्थ होनेपर भी पाठकोंको असली अर्थतक पहुँचानेके लिए