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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariAwadhipublished475 pages

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( ४ ) ही नहीं, पदोंके अर्थ और मूलपाठमें भी कम भूलें नहीं हैं। कुछ उदाहरण लीजिये:— मन्दाकिनि मालिनि सदा सींच। वर-बारि विषम नर-नारि नीच। [पद २३] इसका अर्थ आपने किया है, 'उसे मन्दाकिनीरूपी मालिन सदा अपने उत्तम जलसे इस भाँति सींचती रहती है, जैसे दुष्ट स्वभाववाले स्त्री-पुरुष और नीच चाण्डाल आदि। तात्पर्य यह कि मन्दाकिनीमें बड़े-बड़े पापी और नीच स्नान करते हैं, पर उनके दुष्कर्मोंका प्रभाव वृक्षपर कुछ नहीं पड़ता, वह ज्यों- का-त्यों हरा-भरा रहता है।' पाठक ही विचार करें कि कितना बढ़िया अर्थ किया गया है और कैसा उसका तात्पर्य निकाला गया है। और सुनिये— 'मृदुल चरन, सुभचिह्न, पदज नख अति अभूत उपमाई'। [पद ६२] इसके स्थानपर आपने पाठ माना है:— 'मृदुल चरन, शुभ चिह्न, पदज नख अद्भुत उपमाई'॥ भावार्थमें लिखा है 'जिनके कोमल चरणारविन्दोंमें सुन्दर चिह्न हैं, अँगुलियों और नखोंकी तो कुछ विचित्र ही उपमा है।' द्रष्टव्य है कि गुसाईंजीके भावकी कैसी बेरहमीसे हत्या की गयी है। वास्तवमें इसका अर्थ है, 'कोमल चरणोंमें शुभ चिह्न हैं, अँगुलियों और नखोंकी अत्यन्त अभूतपूर्व उपमा है।' 'अभूत उपमा' का लक्षण महाकवि केशवदासजीने इस प्रकार लिखा भी है:— उपमा जाय कही नहीं, जाको रूप निहारि। अस अभूत उपमा कही, केसवदास विचारि॥ —कविप्रिया पाठक ही विचार करें कि इन दोनोंमें कौन-सा पाठ और अर्थ ठीक है। आगे देखिये—