भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 8

( ५ ) अपनाये सुग्रीव विभीषण तिन न तज्यो छल-छाउ । ‘भरत-सभा सनमानि’ सराहत होत न हृदय अघाउ ॥ [पद १००] इसका भावार्थ आपने लिखा है ‘यद्यपि सुग्रीव और विभीषणने अपना कपट भाव नहीं छोड़ा, पर आपने उन्हें अपनी शरणमें ले ही लिया । और भरतजीकी तो सभामें सदा प्रशंसा करते रहते हैं, प्रशंसा करते-करते तृप्ति ही नहीं होती ।’ कैसा अर्थका अनर्थ हुआ है और प्रसंग कितनी दूर छूट गया है ! इस अर्थसे तो यह सूचित हो रहा है कि सुग्रीव और विभीषणका ‘कपट’ भाव प्रकट होनेके बाद रामजीने उन्हें अपनाया । पर वास्तवमें बात इसकी उलटी है । आगे देखिये, ‘भरतजीकी तो सभामें सदा प्रशंसा करते रहते हैं’, लिखकर टीकाकारने सीतापतिके शील और स्वभावमें भी बट्टा लगा दिया है; क्योंकि भरतजी तो इस योग्य थे ही, फिर यदि सीतापति उनकी सदा प्रशंसा करते रहते हैं, तो इसमें सीतापतिकी कौन-सी विशेषता है ? इस अर्थसे तो कविके कथनका प्रवाह ही टूट जाता है । जरा नीचे लिखे पदमें ऊपरके चरणोंका मिलान कीजिये:— सुनि सीतापति-सील-सुभाउ । मोद न मन, तन पुलक, नयन जल, सो नर खेहर खाउ ॥ सिसुपन ते पितु, मातु, बन्धु, गुरु, सेवक, सचिव सखाउ । कहत राम-बिधु बदन रिसौहैं सपनेहुँ लख्यो न काउ ॥ खेलत सङ्ग अनुज बालक नित, जोगवत अनट अपाउ । जीति हारि चुचुकारि दुलारत, देत दिवावत दाउ ॥ सिला साप-सन्ताप बिगत भइ, परसत पावन पाउ । दई सुगति सो न हेरि हरषि हिय, चरन छुए पछिताउ ॥ भव-धनु भञ्जि निदरि भूपति भृगुनाथ खाइ गये ताउ । छमि अपराध, छमाइ पाँय परि, इतौ न अनत समाउ ॥ कह्यो राज बन दियो नारि बस, गरि गलानि गयो राउ । ता कुमातु को मन जुगवत ज्यौं, निज तनु मरम कुघाउ ॥