भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 6, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 6

( ३ )

पूरा सहारा देती है। इसी उद्देश्यसे टीका लिखी भी जाती है। यही अभिप्राय प्रस्तुत टीकाका भी है; क्योंकि यह तो मैं भली भाँति जानता था कि एक तो वैसा महान् एवं भक्ति-रसमें रँगा हुआ हृदय नहीं है, दूसरे काव्य व्याख्या या परिभाषाका विषय भी नहीं है। इस अवस्थामें मुझे कहाँतक सफलता मिल सकती है, यह बिलकुल स्पष्ट है। विनय-पत्रिकापर कई उत्कृष्ट टीकाएँ निकल चुकी हैं। उनमें कुछ तो प्राचीन ढंगकी हैं और कुछ नवीन। प्राचीन टीकाओंमें भक्तवर बैजनाथकी टीका बहुत अच्छी है; किन्तु पुराने ढंगकी भाषा होनेके कारण वह सर्वसाधारणके लिए उपयोगी नहीं है। उसके बादकी जितनी टीकाएँ हैं, सबपर उस टीकाकी गहरी छाप पड़ी हुई दिखाई पड़ती है। नवीन टीकाओंमें वियोगी हरिजीकी टीका बहुत प्रसिद्ध है। उसपर मेरी बड़ी श्रद्धा थी; किन्तु बहुत दिनोंतक उसे पढ़नेका सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था। पुस्तक प्रकाशित होनेके कई साल बाद एक दिन मैंने उसे यत्र-तत्र देखना शुरू किया। हठात् ४४ वें पदके 'वारानिधे' शब्दकी ऊटपटाँग टिप्पणीपर मेरी दृष्टि पड़ी। कौतूहल बढ़ा और पढ़नेका दृष्टिकोण भी बदल गया। २१२ वें पदके 'पवन' शब्दपर (जोकि 'पूञ्' धातुसे बना है और व्या- करणसे शुद्ध है) पढ़ा, "पवन = पवित्र करनेवाले; शुद्ध शब्द 'पावन' है। ० ० यह आर्ष प्रयोग है"। टीकाकारने यह लिखनेके पहले इस बातपर विचार नहीं किया कि गुसाईंजी सरीखे प्रकांड पंडितसे ऐसी भूल हो सकती है या नहीं। कविता जिस महाकविके पीछे-पीछे चलनेवाली थी एवं जिसका शब्द-कोश असाधारण था, वह अशुद्ध प्रयोग क्यों करने लगा ? उसके लिए तो शब्दोंका अदल-बदल करना बायें हाथका खेल था। २३ वें पदमें 'बारी' शब्दके सीधा अर्थ 'बगीचा' के स्थानपर 'खेतों या वृक्षोंके चारों तरफ लगाये हुए काँटेदार पेड़, जिनसे पशु आदिसे उनकी रक्षा रहती है। यह शब्द बुन्देलखण्डीडी है,' ४० वें पदमें 'यत्पनामी' का अर्थ 'प्रणाम करता हूँ,' ६२ वें पदकी टिप्पणीमें सूर्यका रंग 'श्वेत', १०६ ठे पदमें 'भेई' का अर्थ 'लगाई', १४२ वें पदमें 'तावों' का अर्थ 'धारण करता हूँ, उमंगसे फूला नहीं समाता', १६८ वें पदमें 'खलाए' का अर्थ 'टकाए हुए', लिखा देखकर मेरे आश्चर्यकी सीमा न रही। इस प्रकार श्री वियोगीहरिजीकी टीका शब्दार्थकी भूलोंसे भरी हुई दिखाई पड़ी। इतना