भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 9

( ६ ) कपि-सेवा बस भये कनौड़े कह्यो पवनसुत आउ । देबे को न कछू रिनियाँ हौं धनिक तू पत्र लिखाउ ॥ अपनाये सुग्रीव विभीषन, तिन न तज्यो छल-छाउ। भरत-सभा सनमानि सराहत, होत न हृदय अघाउ ॥ देखिये, उक्त अर्थसे कविताका भाव कितना शिथिल पड़ गया है । वास्तव- में इसका अर्थ है, 'सुग्रीव और विभीषणको अपना लेनेपर भी उन लोगोंने छलकी छाया नहीं छोड़ी (फिर भी आप उन्हें अपनाये ही रह गये) और भरतजी- की सभामें (भरतसे सुग्रीव और विभीषण की) ससम्मान सराहना करते हुए आपका हृदय तृप्त ही नहीं होता था।' इस अर्थकी पुष्टि रामायणकी यह चौपाई भी कर रही है— ते भरतहिं भेंटत सनमाने । राज-सभा रघुबीर बखाने ॥ श्री वियोगी हरिजीने बहुतसे स्थलोंपर भावार्थ लिखनेमें अनर्थ तो किया ही है, मूल पदके शब्दोंका अर्थ भी छोड़ दिया है। जैसे— जो कलिकाल प्रबल अति होतो तुव निदेस तें न्यारो। तौ हरि रोष भरोस दोष गुन तेहि भजते तजि गारो ॥ [ पद १४ ] इसका भावार्थ आपने लिखा है, यदि 'कलिकाल पराक्रमी होता और आपकी आज्ञा न मानता होता, तो हम लोग तुम्हारी आशा छोड़ देते, तुम्हारा गुणगान भी न करते और क्रोधकर उस बेचारेको जो भला-बुरा कहते हैं, सो भी न कहते, बस, सब झंझट छोड़-छाड़कर उसीका भजन करते, जिससे कमसे कम वह विघ्न-बाधा तो न करता ? ॥' पाठक ही देखें कि नीचेके चरणका कैसा अटकलसे मनमाना अर्थ किया गया है। कैसे विचित्र अन्वयसे अर्थ निकाला गया है, वाह ! इसका सीधा और सरल अर्थ यह है—'यदि कलिकाल आपसे अधिक बलवान् होता और आपकी आज्ञा न मानता होता, तो हे हरे ! मैं बदनामीको छोड़कर उसके क्रोध करनेपर भी उसीका भरोसा रखकर तथा उसके दोषोंको गुण समझकर उसीको भजता।' एक नमूना और देखिये—