विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
७. प्रेम-प्रार्थना एवं राम-नाम महिमा
३४० विनय-पत्रिका शुद्ध-बुद्ध आनन्दघन परमात्माकी ही सेवा करनी चाहिये। जो आदमी ऐसा करता है, वही इस एकादशीके व्रतका फल पाता है, और उसका आवागमन (जन्म-मरण) से छुटकारा हो जाता है॥१२॥ द्वादशीके समान बारहवाँ साधन यह है कि ऐसा दान दो कि जिससे तीनों लोकोंमें कोई भय न रह जाय। परोपकार- में रत रहना ही (एकादशी व्रतके बाद द्वादशीका) वह पारण है जिससे फिर कभी शोक नहीं व्यापता ॥१३॥ तेरसके समान तेरहवाँ यत्न यह है कि जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओंको त्यागकर भगवान्का भजन करना चाहिये। क्योंकि वह मन, कर्म और वाणीसे परे हैं—इन्द्रियोंके विषय नहीं हैं— सबमें व्याप्त हैं और स्वयं ही व्याप्य हैं (अर्थात् व्याप्य और व्यापक दोनों वही हैं) तथा अनन्त हैं ॥१४॥ चतुर्दशीके समान चौदहों भुवनोंमें चर और अचर- रूप भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं; किन्तु भेदभाव (मेरा-तेरा) दूर हुए बिना रघुनाथ- जी संसारके गहन जालको नहीं काटते। तात्पर्य यह है कि 'मेरा-तेरा' भाव दूर करो, तंव ईश्वर-कृपा होगी ॥१५॥ पूर्णिमाके समान पन्द्रहवाँ साधन यह है कि सिद्धा प्रेमा भक्तिका रस है (इस रसका आविर्भाव तब होता है, जब ऊपर कहे हुए सब साधन सम्पन्न हो जाते हैं)। इस भगवद्दर्शनरूपी रसको केवल ईश्वरके वे अनन्य भक्त जानते हैं, जो समदर्शी, शीतल (शान्त), अहंकार-रहित, ज्ञान-रत तथा सब विषयोंसे उदासीन हैं ॥१६॥ (गुसाईंजीने मनुष्योंके कल्याणके लिए पहले प्रेम, साधन और भक्तिका उल्लेख किया है और अन्तमें अनेक साधनोंके द्वारा उसे सिद्धाभक्तितक पहुँचा दिया है। फागुनकी पूर्णिमा और चैत्रकी प्रतिपदाके सन्धिकालमें होलिकादहन होता है; अतः वहाँ सांसारिक भाव- के नाश और परमात्माके दर्शनकी उत्सुकताके बीचका समय ही सन्धिकाल है। उसी सन्धिकालमें पूर्णिमाके समान सिद्धाभक्तिकी) होलीमें दैहिक, दैविक और भौतिक—इन तीन प्रकारके दुःखोंको जलाकर अच्छी तरह फाग खेलना चाहिये (आनन्द मनाना चाहिये)। यदि तू अपने हृदयमें परमानन्द चाहता है, तो इस मार्गपर चल (ऊपर कहे हुए पन्द्रह साधनोंको क्रम-क्रमसे साध) ॥१७॥ वेदों, पुराणों और पण्डितोंसे सम्मत परमात्माके चरित ही होलीके गीत हैं। इसपर विचार करके संसारसे तर जाना चाहिये और फिर कभी यमदूतोंके फेरमें नहीं पड़ना चाहिये ॥१८॥ संशयोंका नाश करनेवाले,
विनय-पत्रिका ३४१ दुःखोंको दूर करनेवाले और आनन्द-निधान केवल भगवान् ही हैं। किन्तु वह (रामजी) साधुओंकी कृपा हुए बिना नहीं मिल सकते—चाहे कितने ही उपाय क्यों न करो ॥१९॥ संसार-सागरसे पार होनेके लिए सन्तोंका पवित्र चरण ही नाव है। तुलसीदास कहते हैं कि (सन्तोंके चरणरूपी नावके सहारे अर्थात् सन्तोंकी चरण-सेवा करके) दुःखोंको हरनेवाले श्रीराम बिना परिश्रम ही मिल जाते हैं ॥२०॥ विशेष १—गुसाईंजीने इस पदमें बड़ा ही उपदेशप्रद रूपक बाँधा है। इसमें उन्होंने सिद्धाभक्ति प्राप्त होनेतककी अवधिको ही एक पक्ष माना है। पक्षमें पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, अतः यहाँ भी क्रमशः पन्द्रह साधनोंका उल्लेख है। 'त्रिविध सूल'की होली भी खूब जलायी गयी है। चन्द्रमाकी सोलह कलाएँ हैं। एक-एक तिथिमें एक-एक कलाकी वृद्धि होती है। ठीक इसी तरह काम- शास्त्रमें सोलह कलाओंके नाम इस प्रकार दिये गये हैं— ‘पूषा यशा सुमनसा रतिः प्राप्तिस्तथा धृतिः। ऋद्धिः सौम्या मरीचिञ्च तथा चैवांशुमालिनी ॥ अंगिरा शशिनी चेति छाया सम्पूर्णमंडला । तुष्टिश्चैवामृता चेति कलाः सोमश्च षोडश ॥’ भक्तवर वैजनाथजीने जीवकी भी षोडश कलाओंका उल्लेख किया है— ‘निराशा, सद्वासना, कीर्ति, जिज्ञासा, करुणा, मुदिता, स्थिरता, सुसङ्ग, उदासीनता, श्रद्धा, लज्जा, साधुता, तृप्ति, क्षमा, विवेक, विद्या।' २—‘द्वैत-मति'—जीव और ईश्वरको भिन्न समझनेवाली बुद्धि । ३—'मुकुन्द'—का अर्थ है 'मुक्तिदाता' अर्थात् विष्णु । ब्रह्मवैवर्तके श्रीकृष्णजन्म खण्डके ११० वें अध्यायमें इस शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार लिखी है :— 'मुकुमन्ययमान्तंच निर्वाणमोक्षवाचकम् । तद्ददाति च यो देवो मुकुन्दस्तेन कीर्त्तितः ॥ मुकुं भक्तिरसप्रेम वचनं वेद सम्मतम् । यस्तद्ददाति विप्रेभ्यो मुकुन्दस्तेन कीर्त्तितः ॥'
३४२ विनय-पत्रिका ४—'षट् बरग'—परलोक-विरोधी भीतर स्थित शत्रुओंको कहते हैं । इन्हें अरिवर्ग भी कहते हैं। इनके नाम ये हैं—१ काम (प्राप्त वस्तुके भोगकी इच्छा), २ क्रोध (द्वेष), ३ लोभ (अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिकी इच्छा), ४ मोह (आत्मा अनात्मा अथवा शुभ-अशुभ कार्यका अविवेक), ५ मद (गर्व, अहङ्कार), ६ मत्सर (दूसरेकी वृद्धि देखकर जलना ।) ५—'सप्त धातु'—यह शरीर सात धातुओंसे बना हुआ है:—त्वचा (चमड़ा), रक्त, मांस, मेद (चर्बी), मज्जा (अस्थिगत चिकना पदार्थ), अस्थि (हड्डी) और रेत (शुक्र या वीर्य) । ६—'आठ प्रकृति'—१ पृथिवी, २ जल, ३ अग्नि, ४ वायु, ५ आकाश, ६ मन (यहाँ मन शब्दसे समष्टि मन रूप अहङ्कार है), ७ बुद्धि (यहाँ समष्टि बुद्धि रूप महत्तत्त्वका ग्रहण है) और ८ अहङ्कार (यहाँ महत्तत्त्वसे पूर्व शुद्ध अहङ्कारके कारण अज्ञानरूप मूल प्रकृतिसे अभिप्राय है) । ७—'निरबिकार'—पीछे छ विकारोंका उल्लेख किया जा चुका है । ८—'नवद्वारपुर'—यह शरीर नौ द्वारका पुर है । वे नौ द्वार ये हैं--दो आँखें, दो कान, दो नासिका, मुँह, मूत्रेन्द्रिय और गुदा । इसी प्रकार पुरी भी आठ मानी गयी है—१ ज्ञानेन्द्रिय-पञ्चक (श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और घ्राण), २ कर्मेन्द्रिय-पञ्चक (वाक् , पाणि, पाद, उपस्थ और गुद), ३ अन्तः- करणचतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार), ४ प्राणादि-पञ्चक (प्राण, अपान, समान, उदान, और व्यान), ५ भूत-पञ्चक (पृथिवी, अप, तेज, वायु और आकाश), ६ काम, ७ त्रिविध कर्म और ८ वासना । ९—'चौदह भुवन'—भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् ये सात लोक ऊपरके हैं और अतल, वितल; सुतल, तलातल, रसातल, महातल और पाताल ये सात नीचेके हैं। १०—'भेद'—अर्थात् भेद-बुद्धि। वेदान्तशास्त्रने पाँच भेद माना है— १ जीव ईश्वरका भेद, २ जीवोंका परस्पर भेद, ३ जीव-जड़का भेद, ४ जड़- ईश्वरका भेद, ५ जड़-जड़का भेद। आत्मा इन पाँचों भेदोंसे रहित है। अथवा सजातीय, विजातीय और स्वगत इन तीनों भेदोंसे आत्मा रहित है। अपनी जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, उसे सजातीय सम्बन्ध कहते हैं, जैसे
विनय-पत्रिका ३४३ ब्राह्मणका अन्य ब्राह्मणसे । अन्य जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, जैसे ब्राह्मणका शूद्रसे—उसे विजातीय सम्बन्ध कहते हैं। अपने अवयवों-(अंगों) से जो सम्बन्ध है, जैसे (हाथ, पैर, मस्तक आदिका सम्बन्ध) उसे स्वगत सम्बन्ध कहते हैं । गुसाईंजीने इन्हीं भेदोंको त्यागनेके लिए कहा है । राग कान्हरा २०४ ] जो मन लागै रामचरन अस । देह-गेह-सुत-वित-कलत्र महँ मगन होत बिनु जतन किये जस ॥१॥ द्वन्द्व-रहित, गतमान, ग्यानरत, बिषय-विरत खटाइ नाना कस । सुख-निधान सुजान कोसलपति है प्रसन्न, कहु क्यों न होहिं बस ॥२॥ सर्व-भूत-हित, निर्व्यलीक चित, भगति-प्रेम दृढ़ नेम एक-रस । तुलसिदास यह होइ तबहिं जब द्रवैं ईस, जेहि हतो सीसदस ॥३॥ शब्दार्थ—वित = धन । कलत्र = स्त्री । कस = धातु (काँसा, पीतल, ताँबा आदि), कसौटी । निर्व्यलीक = निर्मल, निर्विकार । भावार्थ—यदि यह मन रामजीके चरणोंमें इस भाँति लग जाय, जैसे वह शरीर, घर, पुत्र, धन, स्त्रीमें बिना किसी प्रकारका यत्न किये ही मग्न हो जाता है ॥१॥ तो वह अनेक कसोंसे खटाकर या अनेक प्रकारके यत्नोंते निर्मल होकर, या (देहादिकी ओरसे) मुड़कर, द्वन्द्व (शीत-उष्ण, सुख-दुःखादि) रहित, मान- रहित, ज्ञानरत, विषयोंसे विरत (निवृत्त) हो जाय । ऐसी दशामें भला कहो तो सही कि आनन्द-घन, ज्ञाननिधान कोशलनाथ रामजी प्रसन्न होकर क्यों नहीं वशमें हो जायँगे ? ॥२॥ सब प्राणियोंकी भलाईका भाव, निर्विकार चित्त, भक्ति- प्रेम, दृढ़ नेम और एक-रस, यह सब तभी होता है, जब रावण-हन्ता भगवान् रामजी कृपा करते हैं ॥३॥ विशेष १—'ग्यानरत'—ज्ञान क्या है, इसपर और अधिक न लिखकर गीताका एक श्लोक लिख देना अधिक उत्तम होगा । भगवान्ने अर्जुनसे कहा है:—
३४४ विनय-पत्रिका सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धिसात्त्विकम् ॥ गीता० अ० १८, श्लोक २० अर्थात् 'जिस ज्ञानसे यह मालूम होता है कि विभक्त अर्थात् भिन्न-भिन्न सब प्राणियोंमें एक ही अविभक्त और अव्यय भाव अथवा तत्त्व है, उसे सात्त्विक ज्ञान जानो ।'—आगेके २०५ वें पदमें गोस्वामीजीने भी यही बात कही है। २—'द्वन्द्व-रहित......एकरस'—गोस्वामीजीने इस पदकी दूसरी पंक्तिमें जो देहादि पाँच वस्तुएँ गिनायी हैं, उनकी संगति उन्होंने तीसरी पंक्तिमें द्वन्द्व- रहित आदि पाँच वस्तुओंसे मिलायी है। उसी क्रमसे पाँचवीं पंक्तिमें भी सर्व- भूतहित आदि कहे गये हैं। अर्थात् द्वन्द्व-रहित होते ही सर्वभूत हितता आ जाती है, गतमान होते ही चित्त निर्विकार हो जाता है, ज्ञान-रत (यहाँ साधारण ज्ञानसे आशय है, क्योंकि विशिष्ट ज्ञान तो भक्तिकी चरमावस्था है और यों तो 'ज्ञानहिं भगतिहिं नहिं कछु भेदा' होते ही भक्ति-प्रेमका उद्रेक दिखाई पड़ता है, विषयविरत होते ही दृढ़ नेम हो जाता है और नाना कसोंमें खटाते ही एकरसता प्राप्त हो जाती है। ३—'खटाइ नाना कस'—इसका अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है:— (१) मन इस प्रकार विषयोंसे अलग हो जाता है, जैसे वह कस (काँसा-ताँबा-पीतल आदि) के पात्रोंमें रखी हुई खटाईसे हट जाता है। (२) अनेक प्रकारसे कसनेपर खरा उतरे। (३) अनेकों परीक्षाओंमें पूर्ण उतरे। [२०५] जौ मन भज्यो चहै हरि-सुरतरु । तौ तजि बिषय-बिकार, सार भजु, अजहूँ जो मैं कहौं सोइ करु ॥१॥ सम, संतोष, बिचार बिमल अति, सतसंगति, ये चारि दृढ़ करि धरु । काम-क्रोध अरु लोभ मोह-मद, राग-द्वेष निसेष करि परिहरु ॥२॥
विनय-पत्रिका ३४५ स्रवन कथा, मुख नाम, हृदय हरि, सिर प्रनाम, सेवा कर अनुसरु । नयननि निरखि कृपा-समुद्र हरि अग-जग-रूप भूप सीतावरु ॥३॥ इहै भगति, बैराग्य, ज्ञान यह, हरि-तोषन यह सुख व्रत आचरु । तुलसिदास सिव-मत मारग यहि चलत सदा सपनेहुँ नाहिंन डरु॥४॥ शब्दार्थ—निसेष = निःशेष, तनिक भी शेष न रहे । अनुसरु = अनुसरण करु । अग = गमनरहित, जड़ । तोषन = प्रसन्न करनेवाला । आचरु = आचरण कर । भावार्थ—रे मन ! जो तू हरिरूपी कल्पवृक्षको भजना चाहता है, तो अभी विषयोंके विकारको छोड़कर साररूप श्रीरामजीको भज और जो मैं कहता हूँ , वही कर ॥१॥ समता, सन्तोष, अत्यन्त निर्मल विचार और सत्संग, इन चारों- को दृढ़ताके साथ धारण कर; काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं राग-द्वेषको बिलकुल ही छोड़ दे ॥२॥ कानोंसे भगवत्कथा सुन, मुखसे रामका नाम ले, हृदयमें भगवान् (के स्वरूप) का ध्यान कर, मस्तकसे उन्हें प्रणाम कर तथा हाथोंसे सेवाका अनुसरण कर । नेत्रोंसे जड़-चैतन्यमय जानकीवल्लभ भगवान् रामचन्द्रको देख ॥३॥ यही भक्ति है, यही वैराग्य है, यही ज्ञान है और यही परमात्माको प्रसन्न करनेवाला शुभ व्रत है । इसीका तू आचरण कर । तुलसीदास कहते हैं कि भगवान् शिवजीका मत है कि इस मार्गपर चलनेसे स्वप्नमें भी डर नहीं रहता ॥४॥ विशेष १—‘नयननि···सीताबरु’—यहाँ गुसाईंजीने नेत्रोंसे भगवान्को देखनेके लिए कहकर परमात्माका रूप भी स्पष्ट रीतिसे बता दिया है कि ‘अग-जग- रूप भूप सीताबरु’। खूब ! २—‘ज्ञान यह’—गुसाईंजी ऊपर बहुत-सी बातें बतलाते हुए कहते हैं कि ‘अग-जग-रूप भूप सीताबरु’ यह समझना ही ज्ञान है । २०४ थे पदकी टीकामें गीताके जिस श्लोकका अवतरण दिया गया है, उससे यहाँ सादृश्य हो जाता है । [२०६] नाहिन और कोउ सरन लायक, दूजो श्रीरघुपति-सम बिपति-निवारन ।
३४६ विनय-पत्रिका काको सहज सुभाउ सेवक बस, काहि प्रनत पर प्रीति अकारन ॥१॥ जन-गुन अलप गनत सुमेरु करि, अवगुन कोटि बिलोकि बिसारन । परम कृपालु, भगत-चिन्तामनि, बिरद पुनीत, पतितजन-तारन ॥२॥ सुमिरत सुलभ, दास-दुख सुनि हरि, चलत तुरत, पटपीत सँभार न । साखि पुरान-निगम-आगम सब, जानत द्रुपद-सुता अरु बारन ॥३॥ जाको जस गावत कबि-कोबिद, जिन्ह के लोभ-मोह, मद-मार न । तुलसिदास तजि आस सकल भजु, कोसलपति मुनिबधू-उधारन ॥४॥ शब्दार्थ—प्रनत = भक्त । बारन = हाथी । कोविद = विद्वान् । मुनिबधू = अहल्या । भावार्थ—श्रीरघुनाथजीके समान विपत्तियोंको दूर करनेवाला दूसरा और कोई नहीं है जो शरण लेने योग्य हो (अर्थात् जिसकी शरण ली जाय)। ऐसा सहज स्वभाव किसका है जो अपने सेवकोंके वशमें रहता हो, और भक्तोंपर बिना किसी कारणके किसका प्रेम है ? ॥१॥ वह (रामजी) भक्तोंके थोड़ेसे गुणको सुमेरुगिरिके समान मानते हैं और करोड़ों दोषोंको देखकर भी (उन दोषोंको) भुला देते हैं। वह परम कृपालु हैं, भक्तोंके लिए चिन्तामणि हैं, पवित्र यशवाले हैं तथा पतितजनोंको तारनेवाले हैं ॥२॥ भगवान् स्मरण करनेमें सुलभ हैं, और भक्तोंके दुःख सुनकर तुरन्त चल पड़ते हैं—अपने पीताम्बरतकको नहीं सँभालते। इसके लिए पुराण, वेद और सब शास्त्र साक्षी हैं; यह बात द्रौपदी और गजेन्द्र- को मालूम है ॥३॥ जिनका यश ऐसे कवि और विद्वान् गाते हैं, जो लोभ, मोह, मद और कामसे रहित हैं। इसलिए हे तुलसीदास ! सब आशाओंको छोड़कर मुनि-वधू (अहल्या) का उद्धार करनेवाले कोशलेन्द्र भगवान् रामचन्द्रको भज ॥४॥
विनय-पत्रिका ३४७ विशेष १—'पटपीत सँभार न'—इसपर महात्मा सूरदासजीने भी बड़ी ही सुन्दर और मधुर रचना की है। आपने उस समयका वर्णन किया है, जब भीष्मपितामहने यह प्रतिज्ञा की थी कि 'आजु रन हरिसों अस्त्र गहैहौं', और भक्तकी प्रतिज्ञाकी लाज रखनेके लिए भगवान् पीताम्बरको सँभाले बिना ही अर्जुनके रथसे कूदकर दौड़े थे :— 'वह पटपीत की फहरानि । रथ ते उतरि अवनि आतुर ह्वै कच-रज की लपटानि ॥ कर धरि चक्र चरन की धावनि नहिं बिसरत वह बानि । मानहु सिंह सैल ते निकस्यो महामत्त गज जानि ॥ जिन गुपाल मेरो पन राख्यो मेटि वेद की कानि । सोई सूर सहाय हमारो निकट भयो है आनि ॥' २—'द्रुपद-सुता'—द्रौपदी; ९३ पदके विशेषमें देखिये। द्रौपदी क्यों नहीं जानेंगी ! नन्दलालको कोई अपने घरसे वस्त्र निकालकर देना तो था नहीं ! कविने कहा भी है :— कबै आप गए थे बिसाहन बजार बीच, कबै बोलि जुलहा बुनाए दरपट से । नन्दजीकी कामरी न काहू बसुदेवजीकी, तीन हाथ पटुका लपेटे रहे कटि से ॥ 'मोहन' भनत यामैं, रावरी बड़ाई कहा, राखि लीन्हीं आनि-बानि ऐसे नटखट से । गोपिनके लीन्हे तब चीर चोरि चोरि अब, जोरि जोरि दैन लागे द्रौपदी के पट से ॥ —मोहन ३—'बारन'—गजेन्द्र; ८३ वें पदके विशेषमें देखिये। ४—'मुनिबधू'—४३ वें पदके विशेषमें देखिये।
३४८ विनय-पत्रिका [ २०७ ] भजिबे लायक, सुखदायक रघुनायक सरिस सरनप्रद दूजो नाहिन। आनंदभवन, दुखदवन, सोकसमन रमारमन गुन गनत सिराहिं न ॥१॥ आरत, अधम, कुजाति, कुटिल, खल, पतित, सभीत, कहूँ जे समाहिं न। सुमिरत नाम बिबसहूँ बारक पावत सो पद, जहाँ सुर जाहिं न ॥२॥ जाके पद कमल लुब्ध मुनि-मधुकर, बिरत जे परम सुगतिहु लुभाहिं न। तुलसिदास सठ तेहि न भजसि कस, कारुनीक जो अनाथहिं दाहिन ॥३॥ शब्दार्थ—समाहिं = समाना, अँटना, आश्रय पाना। मधुकर = भ्रमर। दाहिन = दाहिने, अनुकूल। भावार्थ—श्रीरामजीके समान भजन करने योग्य, सुखदायी और शरण देनेवाला दूसरा कोई नहीं है। आनन्द-स्वरूप, दुःखोंके नाशक, शोकको दूर करनेवाले लक्ष्मीकान्तके गुण गिननेसे समाप्त नहीं हो सकते ॥१॥ जो दुखिया, अधम, कुजाति, कुटिल, दुष्ट, पतित और भयभीत कहीं भी आश्रय नहीं पाते, वे यदि विवश होकर भी एक बार भगवान्के नामका स्मरण करते हैं, तो वह पद पा जाते हैं जहाँ देवता भी नहीं जा सकते ॥२॥ जिनके चरणकमलोंमें वे विरक्त मुनि-रूपी भ्रमर लुब्ध रहते हैं जो मोक्षपर भी लुब्ध नहीं होते, तुलसीदास कहते हैं कि रे शठ ! भला तू अनाथोंके अनुकूल रहनेवाले, परम कारुणिक ऐसे प्रभुका भजन क्यों नहीं करता ? विशेष १—'बिबस हूँ'—यहाँपर यह शब्द बड़ा ही सार्थक प्रयुक्त हुआ है। इस शब्दका यह आशय है कि श्रद्धाभक्तिपूर्वक सुखमय समयमें नामका स्मरण
विनय-पत्रिका ३४९ करना तो दूर रहा, दुःखमें भी, यदि रामनामका स्मरण किया जाता है तो भगवान् उसे तार देते हैं, यह नहीं सोचते कि हर तरहसे हारकर इसने स्मरण किया है, इसलिए इसकी ओर ध्यान नहीं देना चाहिये । राग कल्याण [२०८] नाथ सों कौन बिनती कहि सुनावौं । त्रिविध¹ विधि अमित अवलोकि अघ आपने, सरन सनमुख होत सकुचि सिर नावौं ॥१॥ विरचि हरिभगतिको बेष बर टाटिका, कपट-दल हरित पल्लवनि छावौं । नाम-लगि लाइ लासा ललित-वचन कहि, व्याध ज्यों विषय-विहँगनि वझावौं ॥२॥ कुटिल सतकोटि मेरे रोम पर वारियहि, साधु गनतीमें पहलेहि गनावौं । परम बर्बर खर्व गर्ब-पर्वत चढ़्यो, अज्ञ सर्वग्य, जन-मनि जनावौं ॥३॥ साँच किधौं झूठ मोको कहत कोड- कोउ राम ! रावरो, हौं तुम्हरो कहावौं । बिरदकी लाज करि दास तुलसिहिं देव ! लेहु अपनाइ अब देहु जनि बावौं ॥४॥ शब्दार्थ—विरचि = रचकर, बनाकर । टाटिका = टट्टी । पल्लवनि = पत्तों । लासा = गोंद । बर्बर = नीच । खर्व = क्षुद्र । जन-मनि = भक्तशिरोमणि । भावार्थ—हे नाथ ! आपको मैं किस तरह अपनी विनती कह सुनाऊँ ! अपने तीनों तरहके (कायिक, वाचिक और मानसिक) अगणित पापोंको देखकर आपके सम्मुख शरणमें होते ही लज्जावश सिर झुका लेता हूँ ॥१॥ ईश्वर-भक्तिके १. पाठान्तर—'विविध' ।
३५० विनय-पत्रिका वेशकी सुन्दर टट्टी बनाकर उसे कपट-समूहरूपी हरे पल्लवोंसे छाता हूँ। फिर (राम) नामकी लग्गी लगाकर ललित वचनोंका लासा लगाता हूँ और बहेलियोंकी तरह विषयरूपी पक्षियोंको फँसाता हूँ ॥२॥ मेरे एक-एक रोमपर सौ करोड़ कुटिल वारे (निछावर किये) जा सकते हैं, फिर भी मैं अपनेको प्रथम श्रेणीके सन्तोंमें गिनाता हूँ। मैं परम नीच एवं क्षुद्र हूँ, तथा अभिमानके पहाड़पर चढ़ा हुआ हूँ (अर्थात् बहुत बड़ा अभिमानी हूँ)। मूर्ख होनेपर भी अपनेको सर्वज्ञ और भक्त-मणि सूचित करता हूँ ॥३॥ हे रामजी ! नहीं कह सकता कि सच है या झूठ, पर कोई-कोई मुझे आपहीका (दास) कहते हैं और मैं भी अपनेको आप- हीका कहलवाता हूँ। अतः हे देव ! अब आप अपने बानेकी लाज करके इस सेवक तुलसीको अपना लीजिये; बाँव (तरह) न दीजिये ॥४॥ विशेष १—'निरचि······बिहँगनि बझावौं'—बहेलिया पक्षियोंको फँसानेके लिए बाँसकी टट्टी बनाकर हरे पत्तोंसे छाता है; यहाँ हरिभक्तिका वेष, यानी तिलक- मुद्रा आदि ही टट्टी है और कपट अर्थात् ऊपर तो वैराग्यके चिह्न और अन्त- करणमें विषय-कामना, यही हरे पत्ते हैं। यहाँ संसारको सुनानेके लिए राम- नामका जप ही लग्गी है और ललित वचन ही लासा है। [२०९] नाहिनै नाथ ! अवलंब मोहिं आन की ! करम-मन-वचन पन सत्य करुनानिधे, एक गति राम ! भवदीय पदत्रान की ॥१॥ कोह-मद-मोह-ममतायतन जानि मन, बात नहिं जात कहि ग्यान-बिग्यान की । काम-संकलप उर निरखि बहु बासनहिं, आस नहिं एक हू आँख निरबान की ॥२॥ बेद-बोधित करम धरम बिनु अगम अति, जदपि जिय लालसा अमरपुर जान की।
विनय-पत्रिका : ३५१ सिद्ध-सुर-मनुज-दनुजादि सेवत कठिन, द्रवहिं हठजोग दिये भोग बलि प्रान की ॥३॥ भगति दुर्लभ परम, संभु-सुक-मुनि-मधुप, प्यास पदकंज-मकरंद-मधुपान की। पतित-पावन सुनत नाम बिस्राम-कृत, भ्रमित पुनि समुझि चित ग्रंथि अभिमान की ॥४॥ नरक-अधिकार मम घोर संसार-तम- कूपकहिं, भूप ! मोहिं सक्ति आपान की। दास तुलसी सोउ त्रास नहिं गनत मन, सुमिरि गुह गीध गज ग्याति हनुमान की ॥५॥ शब्दार्थ—भवदीय = आपके। पदत्रान = जूता। आँक = अंश। कूपकहिं = कुएँमें। आपानकी = आपकी। ग्याति = (ज्ञाति) जाति। भावार्थ—हे नाथ ! मुझे दूसरेका अवलम्ब नहीं है। हे करुणानिधे ! मन, वचन और कर्मसे मेरी यह सत्य प्रतिज्ञा है कि मुझे केवल आपकी पनहीका सहारा है ॥१॥ मैं जानता हूँ कि मेरा मन क्रोध, मद, मोह और ममताका घर है; इसीसे मैं ज्ञान-विज्ञानकी बातें नहीं कह सकता। हृदयमें अनेक तरहकी कामनाओंके संकल्पों और वासनाओंको देखकर किसी भी अंशमें मुझे मोक्षकी आशा नहीं है (क्योंकि वासनाओंके आत्यन्तिक लयका नाम ही मोक्ष है, किन्तु वासनाएँ बनी हुई हैं, इसलिए मुक्ति नहीं हो सकती) ॥२॥ यद्यपि वेदोक्त कर्म- धर्मके बिना (स्वर्ग-प्राप्ति) अत्यन्त कठिन है, फिर भी मेरे हृदयमें स्वर्गमें जानेकी लालसा है। इसके सिवा सिद्ध, देवता, मनुष्य एवं राक्षसोंकी सेवा करना बहुत कठिन है। क्योंकि ये लोग हठयोग करने और प्राणोंकी बलि देकर भोग चढ़ाने- से पिघलते हैं (किन्तु यह मेरा किया नहीं हो सकता) ॥३॥ रही भक्ति, सो वह बहुत ही दुर्लभ वस्तु है; क्योंकि आपके चरणारविन्दके मधुर परागको पान करनेके लिए शिव, शुकदेव तथा (अन्यान्य बड़े-बड़े) मुनिरूपी भौंरे प्यासे रहते हैं (ऐसी दशामें मेरे जैसे अकिंचनको वह कैसे मिल सकता है ?)। मैंने सुना है कि आपका नाम पतितोंको पवित्र करनेवाला तथा शान्ति देनेवाला है; फिर भी
३५२ विनय-पत्रिका चित्तमें अभिमानकी गाँठ पड़ी रहनेके कारण समझ-बूझकर भ्रममें पड़ जाता हूँ ॥४॥ हे राजन् ! घोर संसाररूपी अन्धकूपमें पड़ा हुआ मैं (सब तरहसे) नरक- का ही अधिकारी हूँ। यदि मुझे किसी बातका बल है, तो बस आपहीका । (आपहीके भरोसे) यह तुलसीदास निषाद, गीध और हनुमान्की जातिका स्मरण करके अपने मनमें उसका (संसारान्धकूप या नरकमें पड़नेका) भी भय नहीं मानता ॥५॥ विशेष १—'गुह'—निषाद; १०६ पदके विशेषमें देखिये । २—'गीध'—२१५ पदके विशेषमें देखिये । ३—'गज'—८३ पदके विशेषमें देखिये । [२१०] और कहँ ठौर रघुवंस - मनि ! मेरे । पतित-पावन प्रनत-पाल असरन - सरन, बाँकुरे बिरद बिरुदैत केहि केरे ॥१॥ समुझि जिय दोस अति रोस करि राम जो, करत नहिं कान बिनती बदन फेरे । तदपि है निडर हौं कहौं करुना-सिन्धु, क्यौंडव रहि जात सुनि बात बिनु हेरे ॥२॥ मुख्य रुचि होत बसिबेकी पुर रावरे, राम ! तेहि रुचिहि कामादि गन घेरे । अगम अपबर्ग, थरु सर्ग सुकृतैकफल, नाम - बल क्यों बसौं जम-नगर नेरे ॥३॥ कतहुँ नहिं ठाउँ, कहँ जाउँ कोसलनाथ ! दीन बितहीन हौं, बिकल बिनु डेरे । दास तुलसिहिं बास देहु अब करि कृपा, बसत गज गीध ब्याधादि जेहि खेरे ॥४॥
विनय-पत्रिका ३५३ शब्दार्थ—क्योंऽब = क्यों + अब। अपबर्ग = मोक्ष। नेरे = निकट, पास। डेरे = डेरा, स्थान। खेरे = गाँवमें। भावार्थ—हे रघुवंशमणि ! मेरे लिए और कहाँ ठिकाना है। आप पापियों- को पवित्र करनेवाले एवं अशरण-शरण हैं। आपका-सा बाँका या निराला बाना किस बानेवालेका है? ॥१॥ हे रामजी ! यद्यपि आप मेरे अपराधोंको अपने हृदयमें समझकर अत्यन्त क्रोध करनेके कारण मेरी विनतीपर ध्यान नहीं दे रहे हैं और मेरी ओरसे मुँह फेरे हुए हैं, तथापि हे करुणा-सागर ! मैं निडर होकर कहता हूँ कि मेरी बात सुनकर मेरी ओर देखे बिना आपसे कैसे रहा जाता है? ॥२॥ मुख्य बात यह है कि आपके पुरमें बसनेकी मेरी रुचि होती है; किन्तु हे रामजी ! उस रुचिको कामादि गणोंने घेर लिया है। मोक्ष दुर्लभ है और स्वर्ग भी एकमात्र पुण्यका फल है; नामके बलसे यमपुरीके निकट भी मैं कैसे जा सकता हूँ? तात्पर्य यह कि मोक्ष, स्वर्ग तथा नरक किसीका भी मैं अधि- कारी नहीं ॥३॥ हे कोशलेन्द्र ! मुझे कहीं भी ठौर नहीं; कहाँ जाऊँ? मैं गरीब और निर्धन हूँ, कोई स्थान न रहनेके कारण व्याकुल हो रहा हूँ नाथ ! अब आप कृपा करके इस सेवक तुलसीको उस गाँवमें रहनेकी जगह दीजिये, जहाँ गजेन्द्र, गीध और व्याध आदि रहते हैं ॥४॥ विशेष १—'करुना-सिन्धु'—कहनेका यह भाव है कि आप तो करुणा-सागर हैं, फिर मुझपर करुणा किये बिना आपसे कैसे रहा जाता है? २—'गज'—८३ पदके विशेषमें देखिये। ३—'गीध'—१२५ पदके विशेषमें देखिये। ४—'व्याध'—१४ पदके विशेषमें देखिये। ५—'व्याधादि'—इसमें 'आदि' शब्द शबरी, गणिका, अजामिल वगैरहके लिए आया है। [ २११ ] कबहुँ रघुवंस-मनि ! सो कृपा करहुगे। जेहि कृपा व्याध, गज, विप्र, खल नर तरे, तिन्हहिं सम मानि मोहिं नाथ उद्धरहुगे ॥१॥ २३
३५४ विनय-पत्रिका जोनि बहु जनमि किये करम खल बिबिध बिधि, अधम चाचरन कछु हृदय नहिं धरहुगे। दीन हित अजित सरबग्य समरथ प्रनत- पाल चित मृदुल निज गुननि अनुसरहुगे ॥२॥ मोह मद मान कामादि खल-मंडली सकुल निरमूल करि दुसह दुख हरहुगे। जोग-जप-जग्ग बिग्यान ते अधिक अति, अमल दृढ़ भगति दै परम सुख भरहुगे ॥३॥ मंदजन-मौलिमनि सकल साधन-हीन, कुटिल मन मलिन जिय जानि जो डरहुगे। दास तुलसी बेद-बिदित बिरुदावली बिमल जस नाथ ! केहि भाँति बिस्तरहुगे ॥४॥ शब्दार्थ—विप्र = ब्राह्मण, अजामिल । मृदुल = कोमल । मौलिमनि = शिरोमणि । कुटिल = दुष्ट, विकारी । मलिन = पापी । बिरुदावली = गुणावली । भावार्थ—हे रघुवंशमणि ! क्या कभी आप मुझपर वह कृपा करेंगे जिस कृपासे व्याध, गजेन्द्र, अजामिल आदि दुष्ट मनुष्य तरे थे ? हे नाथ ! क्या आप उन लोगोंके समान मुझे भी मानकर मेरा उद्धार करेंगे ? ॥१॥ बहुतसी योनियोंमें जन्म लेकर मैंने नाना प्रकारके दुष्ट कर्म किये हैं; किन्तु आप मेरे नीच आचरण- को हृदयमें न लाइयेगा । आप दीनोंके हितू, अजेय, सर्वज्ञ, सामर्थ्यवान और प्रणतपाल हैं ! क्या आप अपने कोमल चित्तसे अपने (इन नामोंके) गुणोंका अनुसरण करेंगे ? अर्थात् आप दीनोंके हितू हैं, अतः क्या मुझ दीनका हित न करेंगे ? आप अजेय हैं, अतः क्या मेरे काम-क्रोधादि शत्रुओंको परास्त न करेंगे ? आप सर्वज्ञ हैं, अतः क्या मेरे हृद्गत भावोंको न समझेंगे ? आप समर्थ हैं, अतः क्या मुझ अधर्मीको अपने सामर्थ्यसे न तारेंगे ? आप प्रणतपाल हैं, अतः क्या मुझ शरणागतका पालन न करेंगे ? ॥२॥ क्या आप (मेरे हृदय-स्थित) मोह, मद, मान, काम आदि दुष्टोंकी मण्डलीको उनके परिवार-सहित समूल नष्ट करके मेरे असह्य दुःखोंको दूर करेंगे ? क्या आप योग, जप, यज्ञ और
विनय-पत्रिका ३५५ विज्ञानकी अपेक्षा अत्यधिक निर्मल अपनी दृढ़ भक्ति (अनन्य भक्ति) देकर मेरे हृदयमें परमानन्द भरेंगे ? ॥३॥ यदि आप अपने हृदयमें इस तुलसीदासको मन्द पुरुषोंका शिरोमणि, सब प्रकारके साधनोंसे हीन, कुटिल मनवाला और मलिन समझकर डरेंगे (कि इतने बड़े पातकीका उद्धार करनेसे लोक-निन्दा होगी), तो हे नाथ ! आप वेद-विख्यात अपनी विरुदावली और विमल यशका विस्तार किस प्रकार करेंगे ? ॥४॥ विशेष १—'सकुल'—झूठ बोलना, छल-कपट, निन्द्य कर्म आदि ही काम-क्रोधादि खलोंके परिवार हैं । क्योंकि कामादिसे ही उक्त दुर्गुणोंकी उत्पत्ति होती है । २—'व्याध'—९४ पदके विशेषमें देखिये । ३—'गज'—२१५ पदके विशेषमें देखिये । ४—'विप्र'—अजामिल; ५७ पदके विशेषमें देखिये । राग केदारा [ २१२ ] रघुपति विपति-दवन । परम कृपालु, प्रनत-प्रतिपालक, पतित-पवन ॥१॥ कूर, कुटिल, कुलहीन, दीन, अति मलिन जवन । सुमिरत नाम राम पठये सब अपने भवन ॥२॥ गज-पिंगला-अजामिल से खल गनै धौं कवन । तुलसिदास प्रभु केहि न दीन्हि गति जानकी-रवन ॥३॥ शब्दार्थ—दवन = दमन, नाश करनेवाले । पवन = पवित्र करनेवाला । जवन = जो । भावार्थ—श्रीरघुनाथजी विपत्तियोंका नाश करनेवाले हैं। वह बड़े ही
३५६ विनय-पत्रिका कृपालु, दीनोंको पालनेवाले तथा पापियोंको पवित्र करनेवाले हैं ॥१॥ क्रूरों, दुष्टों, नीचों, गरीबों और अत्यन्त मलिन या पापियोंको भी नामका स्मरण करते ही रामजीने अपने धाममें भेज दिया ॥२॥ गजेन्द्र, पिंगला बेश्या तथा अजामिल आदि दुष्टोंकी गणना कौन कर सकता है ? (थोड़ेमें यों कहा जा सकता है कि) तुलसीदासके प्रभु जानकी-वल्लभ श्रीरामजीने किसे मुक्त नहीं कर दिया ? ॥३॥ विशेष १—'पवन'—वियोगी हरिजीने लिखा है, “पवन=पवित्र करनेवाला; शुद्ध शब्द 'पावन' है । यह आर्ष प्रयोग है।” किन्तु वास्तवमें 'पवन' शुद्ध संस्कृत शब्द है, आर्ष प्रयोग नहीं है। यह 'पूञ् पवने' धातुसे बना है। इसका अर्थ है 'पवित्र करनेवाला'। इसीसे वायुको भी पवन कहते हैं। क्योंकि वायुसे सब वस्तुएँ पवित्र होती हैं।—मेदिनी कोषमें भी लिखा है, 'कुम्भकारस्य आमघटादिपाकस्थानम्, पवित्रीकरणं च' अर्थात् कुम्भारके घड़ा आदि बर्तन पकानेका स्थान 'आवाँ' । २—'जवन'—इसका अर्थ पतित 'यवन' भी हो सकता है। इसका इतिहास पीछे लिखा जा चुका है। ४६ पदके विशेषमें देखिये। ३—'गज'—२१५ पदके विशेषमें देखिये। ४—'पिंगला'—९४ पदके विशेषमें देखिये। ५—'अजामिल—५७ पदके विशेषमें देखिये। [ २१३ ] हरि-सम आपदा-हरन । नहिं कोउ सहज कृपालु दुसह दुख-सागर-तरन ॥१॥ गज निज बल अवलोकि कमल गहि गयो सरन । दीन बचन सुनि चले गरुड़ तजि सुनाभ-धरन ॥२॥
विनय-पत्रिका ३५७ द्रुपदसुता को लग्यो दुसासन नगन करन । 'हा हरि पाहि' कहत पूरे पट बिबिध बरन ॥३॥ इहै जानि सुर-नर-मुनि-कोबिद् सेवत चरन । तुलसिदास प्रभुको अभय कियो नृग-उद्धरन ॥४॥ शब्दार्थ—सुनाभ = चक्रसुदर्शन । कोबिद = पण्डित, ज्ञानी । नृग = एक राजाका नाम, राजा नृग । भावार्थ—भगवान्के समान आपदाओंको हरनेवाला, स्वाभाविक कृपालु तथा असह्य दुःख-सागरसे पार करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ॥१॥ जब गजेन्द्रने अपना बल देखकर (अपने बलकी परीक्षा कर चुकनेके बाद) कमल-पुष्प लेकर आपकी शरणमें पहुँचा, तब आप उसके दीन वचन सुनते ही चक्रसुदर्शन लेकर गरुड़को छोड़ (पैदल ही) चल पड़े ॥२॥ जब दुःशासन द्रौपदीको (भरी सभामें) नग्न करने लगा, तब उसके 'हा प्रभो ! रक्षा करो' कहते ही अनेक रंगकी साड़ियोंसे उसे पूर्ण कर दिया—उसकी लाज बचायी ॥३॥ यही सब जानकर देवता, मनुष्य, मुनि और पण्डित आपके चरणोंकी सेवा करते हैं । राजा नृगका उद्धार करनेवाले तुलसीदासके स्वामीने किसको अभय नहीं किया ? (जो कोई भी उनकी शरणमें गया, सबको निर्भय कर दिया) ॥४॥ विशेष १—'सुनाभ'—कुछ टीकाकारोंने इसका अर्थ 'नाभि' लिखा है; किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं जँचता । २—'गज'—२१५ पदके विशेषमें देखिये । ३—'द्रुपदसुता'—९३ पदके विशेषमें देखिये । ४—'नृग'—सत्ययुगमें राजा नृग बड़े दानी थे । प्रतिदिन एक करोड़ गोदान करनेका उनका नियम था। एक बार उनकी गायोंमें भूलसे एक ऐसी गाय आ मिली, जिसे वह एक बार किसी ब्राह्मणको दे चुके थे । राजाने उसे पहचाना नहीं, और दूसरे ब्राह्मणको दे दिया । पहला ब्राह्मण अपनी गायका
३५८ विनय-पत्रिका पता लगाकर उस ब्राह्मणके पास पहुँचा और उसे चोर समझकर गायके लिए झगड़ा करने लगा । अन्तमें दोनों राजाके पास गये । राजाके राजी करनेपर भी वे दोनों ब्राह्मण राजी नहीं हुए और गाय छोड़कर यह शाप देते हुए चले गये कि 'तुमने हमें धोखा दिया है, इसलिए तुम गिरगिट हो जाओ । विप्रका शाप सत्य हुआ । बेचारे राजा बहुत दिनोंतक, द्वारकाके एक कुएँमें पड़े रहे। कहा भी है, 'कोटि गऊराजा नृग दीन्हें तेउ भव-कूप परे ।' भगवान्ने कृष्णावतारमें उस गिरगिटको कुएँसे निकाला और दिव्य शरीर देकर वैकुण्ठमें भेज दिया । राग कल्याण [ २१४ ] ऐसी कौन प्रभुकी रीति ? बिरद हेतु पुनीत परिहरि पाँवरनि पर प्रीति ॥१॥ गई मारन पूतना कुच कालकूट लगाइ । मातु की गति दई ताहि कृपालु जादवराइ ॥२॥ काम-मोहित गोपिकनि पर कृपा अतुलित कीन्ह । जगत-पिता विरंचि जिन्हके चरनकी रज लीन्ह ॥३॥ नेम तें सिसुपाल दिन प्रति देत गनि गनि गारि । कियो लीन सु आपुमें हरि राज-सभा मँझारि ॥४॥ ब्याध चित दै चरन माऱ्यो मूढ़मति मृग जानि । सो सदेह स्वलोक पठयो प्रगट करि निज बानि ॥५॥ कौन तिन्हकी कहै जिन्हके सुकृत अरु अघ दोउ । प्रगट पातकरूप तुलसी सरन राख्यो सोउ ॥६॥ शब्दार्थ—पाँवरनि = नीचों । कुच = स्तन । कालकूट = विष । जादवराइ = श्रीकृष्ण मँझारि = बीचमें । चित दै = निशाना साधकर । बानि = आदत, स्वभाव । भावार्थ—ऐसी रीति और किस प्रभुकी है जो अपने बाने (की लाज रखने) के लिए पवित्र पुरुषों (ऋषियों) को छोड़कर नीचों (शबरी, चांडाल आदि) पर प्रेम करता हो ? ॥१॥ पूतना अपने स्तनोंमें विष लगाकर मारने
विनय-पत्रिका ३५९ गयी, किन्तु परम कृपालु भगवान् श्रीकृष्णने उसे माताके समान गति दी (स्वर्गमें भेज दिया) ॥२॥ आपने काम-मोहित गोपियोंपर ऐसी कृपा की थी जिसकी तुलना नहीं की जा सकती, और जिसके कारण जगत्-पिता ब्रह्माने भी उनका (गोपियोंका) चरण-रज लिया ॥३॥ शिशुपाल नियम बाँधकर प्रतिदिन भगवान्- को गिन-गिनकर गालियाँ दिया करता था; किन्तु प्रभुने राज-सभाके बीचमें उसे अपनेमें लीन कर लिया (मारकर मुक्त कर दिया) ॥४॥ मूढ़ बुद्धि व्याधने मृग जानकर निशाना साधकर आपके चरणमें बाण मारा, पर आपने उसे सदेह अपने लोकमें भेजकर अपने (दयालु) स्वभावका परिचय दिया ॥५॥ किन्तु उन लोगोंकी बात कौन कहे जिन लोगोंके पुण्य और पाप दोनों थे (अर्थात् जिन लोगोंने पुण्य और पाप दोनों किये थे ); आपने तो अपनी शरणमें इस तुलसीदासको भी रख लिया जो प्रत्यक्ष पापकी मूर्ति है ॥६॥ विशेष १—आजकलके अधिकांश उपासक भगवान्के अवतारोंमें भेद मानते हैं, किन्तु शास्त्रोंके सिद्धान्तोंपर विचार करनेवाले गुसाईंजीकी इस पदमें अभेद दृष्टि दिखाई पड़ती है । गुसाईंजीकी रचनाओंमें इस प्रकार अभेदकी झलक कई जगह दिखाई पड़ती है । २—'पूतना'—पूर्वजन्ममें एक अप्सरा थी । भगवान् वामनका बाल- स्वरूप देखकर उसे इच्छा हुई कि स्नेहपूर्वक इस बालकको स्तन पिलाऊँ । अन्तमें वह किसी घोर पापके कारण राक्षसी हुईं । कृष्ण भगवान्के मामा कंसने स्तनका दूध पिलाकर अविनाशी भगवान् कृष्णको मार डालनेके लिए उसे भेजा था । किन्तु दयालु परमात्माने उसकी बुरी नीयतपर ध्यान नहीं दिया और उसकी पूर्वजन्मकी अभिलाषा पूरी की । ३—'काम-मोहित'—इससे यह न समझना चाहिये कि ब्रजांगनाएँ कुलटा थीं, और भगवान् श्रीकृष्ण उनके साथ रमण करते थे । आजकल लोगोंकी ऐसी ही भ्रान्त धारणा हो गयी है, और पुराणोंके अच्छे-अच्छे संस्कृत टीका- कारोंने श्रीमद्भागवतके दशमस्कंध रासपंचाध्यायीपर इसी दृष्टिकोणसे टीका भी की है । किन्तु यथार्थतः न तो उसका वह अर्थ है और न वह संगत ही प्रतीत