विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४६ विनय-पत्रिका काको सहज सुभाउ सेवक बस, काहि प्रनत पर प्रीति अकारन ॥१॥ जन-गुन अलप गनत सुमेरु करि, अवगुन कोटि बिलोकि बिसारन । परम कृपालु, भगत-चिन्तामनि, बिरद पुनीत, पतितजन-तारन ॥२॥ सुमिरत सुलभ, दास-दुख सुनि हरि, चलत तुरत, पटपीत सँभार न । साखि पुरान-निगम-आगम सब, जानत द्रुपद-सुता अरु बारन ॥३॥ जाको जस गावत कबि-कोबिद, जिन्ह के लोभ-मोह, मद-मार न । तुलसिदास तजि आस सकल भजु, कोसलपति मुनिबधू-उधारन ॥४॥ शब्दार्थ—प्रनत = भक्त । बारन = हाथी । कोविद = विद्वान् । मुनिबधू = अहल्या । भावार्थ—श्रीरघुनाथजीके समान विपत्तियोंको दूर करनेवाला दूसरा और कोई नहीं है जो शरण लेने योग्य हो (अर्थात् जिसकी शरण ली जाय)। ऐसा सहज स्वभाव किसका है जो अपने सेवकोंके वशमें रहता हो, और भक्तोंपर बिना किसी कारणके किसका प्रेम है ? ॥१॥ वह (रामजी) भक्तोंके थोड़ेसे गुणको सुमेरुगिरिके समान मानते हैं और करोड़ों दोषोंको देखकर भी (उन दोषोंको) भुला देते हैं। वह परम कृपालु हैं, भक्तोंके लिए चिन्तामणि हैं, पवित्र यशवाले हैं तथा पतितजनोंको तारनेवाले हैं ॥२॥ भगवान् स्मरण करनेमें सुलभ हैं, और भक्तोंके दुःख सुनकर तुरन्त चल पड़ते हैं—अपने पीताम्बरतकको नहीं सँभालते। इसके लिए पुराण, वेद और सब शास्त्र साक्षी हैं; यह बात द्रौपदी और गजेन्द्र- को मालूम है ॥३॥ जिनका यश ऐसे कवि और विद्वान् गाते हैं, जो लोभ, मोह, मद और कामसे रहित हैं। इसलिए हे तुलसीदास ! सब आशाओंको छोड़कर मुनि-वधू (अहल्या) का उद्धार करनेवाले कोशलेन्द्र भगवान् रामचन्द्रको भज ॥४॥