विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 358, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३४७ विशेष १—'पटपीत सँभार न'—इसपर महात्मा सूरदासजीने भी बड़ी ही सुन्दर और मधुर रचना की है। आपने उस समयका वर्णन किया है, जब भीष्मपितामहने यह प्रतिज्ञा की थी कि 'आजु रन हरिसों अस्त्र गहैहौं', और भक्तकी प्रतिज्ञाकी लाज रखनेके लिए भगवान् पीताम्बरको सँभाले बिना ही अर्जुनके रथसे कूदकर दौड़े थे :— 'वह पटपीत की फहरानि । रथ ते उतरि अवनि आतुर ह्वै कच-रज की लपटानि ॥ कर धरि चक्र चरन की धावनि नहिं बिसरत वह बानि । मानहु सिंह सैल ते निकस्यो महामत्त गज जानि ॥ जिन गुपाल मेरो पन राख्यो मेटि वेद की कानि । सोई सूर सहाय हमारो निकट भयो है आनि ॥' २—'द्रुपद-सुता'—द्रौपदी; ९३ पदके विशेषमें देखिये। द्रौपदी क्यों नहीं जानेंगी ! नन्दलालको कोई अपने घरसे वस्त्र निकालकर देना तो था नहीं ! कविने कहा भी है :— कबै आप गए थे बिसाहन बजार बीच, कबै बोलि जुलहा बुनाए दरपट से । नन्दजीकी कामरी न काहू बसुदेवजीकी, तीन हाथ पटुका लपेटे रहे कटि से ॥ 'मोहन' भनत यामैं, रावरी बड़ाई कहा, राखि लीन्हीं आनि-बानि ऐसे नटखट से । गोपिनके लीन्हे तब चीर चोरि चोरि अब, जोरि जोरि दैन लागे द्रौपदी के पट से ॥ —मोहन ३—'बारन'—गजेन्द्र; ८३ वें पदके विशेषमें देखिये। ४—'मुनिबधू'—४३ वें पदके विशेषमें देखिये।