विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
विनय-पत्रिका ३४७ विशेष १—'पटपीत सँभार न'—इसपर महात्मा सूरदासजीने भी बड़ी ही सुन्दर और मधुर रचना की है। आपने उस समयका वर्णन किया है, जब भीष्मपितामहने यह प्रतिज्ञा की थी कि 'आजु रन हरिसों अस्त्र गहैहौं', और भक्तकी प्रतिज्ञाकी लाज रखनेके लिए भगवान् पीताम्बरको सँभाले बिना ही अर्जुनके रथसे कूदकर दौड़े थे :— 'वह पटपीत की फहरानि । रथ ते उतरि अवनि आतुर ह्वै कच-रज की लपटानि ॥ कर धरि चक्र चरन की धावनि नहिं बिसरत वह बानि । मानहु सिंह सैल ते निकस्यो महामत्त गज जानि ॥ जिन गुपाल मेरो पन राख्यो मेटि वेद की कानि । सोई सूर सहाय हमारो निकट भयो है आनि ॥' २—'द्रुपद-सुता'—द्रौपदी; ९३ पदके विशेषमें देखिये। द्रौपदी क्यों नहीं जानेंगी ! नन्दलालको कोई अपने घरसे वस्त्र निकालकर देना तो था नहीं ! कविने कहा भी है :— कबै आप गए थे बिसाहन बजार बीच, कबै बोलि जुलहा बुनाए दरपट से । नन्दजीकी कामरी न काहू बसुदेवजीकी, तीन हाथ पटुका लपेटे रहे कटि से ॥ 'मोहन' भनत यामैं, रावरी बड़ाई कहा, राखि लीन्हीं आनि-बानि ऐसे नटखट से । गोपिनके लीन्हे तब चीर चोरि चोरि अब, जोरि जोरि दैन लागे द्रौपदी के पट से ॥ —मोहन ३—'बारन'—गजेन्द्र; ८३ वें पदके विशेषमें देखिये। ४—'मुनिबधू'—४३ वें पदके विशेषमें देखिये।
३४८ विनय-पत्रिका [ २०७ ] भजिबे लायक, सुखदायक रघुनायक सरिस सरनप्रद दूजो नाहिन। आनंदभवन, दुखदवन, सोकसमन रमारमन गुन गनत सिराहिं न ॥१॥ आरत, अधम, कुजाति, कुटिल, खल, पतित, सभीत, कहूँ जे समाहिं न। सुमिरत नाम बिबसहूँ बारक पावत सो पद, जहाँ सुर जाहिं न ॥२॥ जाके पद कमल लुब्ध मुनि-मधुकर, बिरत जे परम सुगतिहु लुभाहिं न। तुलसिदास सठ तेहि न भजसि कस, कारुनीक जो अनाथहिं दाहिन ॥३॥ शब्दार्थ—समाहिं = समाना, अँटना, आश्रय पाना। मधुकर = भ्रमर। दाहिन = दाहिने, अनुकूल। भावार्थ—श्रीरामजीके समान भजन करने योग्य, सुखदायी और शरण देनेवाला दूसरा कोई नहीं है। आनन्द-स्वरूप, दुःखोंके नाशक, शोकको दूर करनेवाले लक्ष्मीकान्तके गुण गिननेसे समाप्त नहीं हो सकते ॥१॥ जो दुखिया, अधम, कुजाति, कुटिल, दुष्ट, पतित और भयभीत कहीं भी आश्रय नहीं पाते, वे यदि विवश होकर भी एक बार भगवान्के नामका स्मरण करते हैं, तो वह पद पा जाते हैं जहाँ देवता भी नहीं जा सकते ॥२॥ जिनके चरणकमलोंमें वे विरक्त मुनि-रूपी भ्रमर लुब्ध रहते हैं जो मोक्षपर भी लुब्ध नहीं होते, तुलसीदास कहते हैं कि रे शठ ! भला तू अनाथोंके अनुकूल रहनेवाले, परम कारुणिक ऐसे प्रभुका भजन क्यों नहीं करता ? विशेष १—'बिबस हूँ'—यहाँपर यह शब्द बड़ा ही सार्थक प्रयुक्त हुआ है। इस शब्दका यह आशय है कि श्रद्धाभक्तिपूर्वक सुखमय समयमें नामका स्मरण
विनय-पत्रिका ३४९ करना तो दूर रहा, दुःखमें भी, यदि रामनामका स्मरण किया जाता है तो भगवान् उसे तार देते हैं, यह नहीं सोचते कि हर तरहसे हारकर इसने स्मरण किया है, इसलिए इसकी ओर ध्यान नहीं देना चाहिये । राग कल्याण [२०८] नाथ सों कौन बिनती कहि सुनावौं । त्रिविध¹ विधि अमित अवलोकि अघ आपने, सरन सनमुख होत सकुचि सिर नावौं ॥१॥ विरचि हरिभगतिको बेष बर टाटिका, कपट-दल हरित पल्लवनि छावौं । नाम-लगि लाइ लासा ललित-वचन कहि, व्याध ज्यों विषय-विहँगनि वझावौं ॥२॥ कुटिल सतकोटि मेरे रोम पर वारियहि, साधु गनतीमें पहलेहि गनावौं । परम बर्बर खर्व गर्ब-पर्वत चढ़्यो, अज्ञ सर्वग्य, जन-मनि जनावौं ॥३॥ साँच किधौं झूठ मोको कहत कोड- कोउ राम ! रावरो, हौं तुम्हरो कहावौं । बिरदकी लाज करि दास तुलसिहिं देव ! लेहु अपनाइ अब देहु जनि बावौं ॥४॥ शब्दार्थ—विरचि = रचकर, बनाकर । टाटिका = टट्टी । पल्लवनि = पत्तों । लासा = गोंद । बर्बर = नीच । खर्व = क्षुद्र । जन-मनि = भक्तशिरोमणि । भावार्थ—हे नाथ ! आपको मैं किस तरह अपनी विनती कह सुनाऊँ ! अपने तीनों तरहके (कायिक, वाचिक और मानसिक) अगणित पापोंको देखकर आपके सम्मुख शरणमें होते ही लज्जावश सिर झुका लेता हूँ ॥१॥ ईश्वर-भक्तिके १. पाठान्तर—'विविध' ।
३५० विनय-पत्रिका वेशकी सुन्दर टट्टी बनाकर उसे कपट-समूहरूपी हरे पल्लवोंसे छाता हूँ। फिर (राम) नामकी लग्गी लगाकर ललित वचनोंका लासा लगाता हूँ और बहेलियोंकी तरह विषयरूपी पक्षियोंको फँसाता हूँ ॥२॥ मेरे एक-एक रोमपर सौ करोड़ कुटिल वारे (निछावर किये) जा सकते हैं, फिर भी मैं अपनेको प्रथम श्रेणीके सन्तोंमें गिनाता हूँ। मैं परम नीच एवं क्षुद्र हूँ, तथा अभिमानके पहाड़पर चढ़ा हुआ हूँ (अर्थात् बहुत बड़ा अभिमानी हूँ)। मूर्ख होनेपर भी अपनेको सर्वज्ञ और भक्त-मणि सूचित करता हूँ ॥३॥ हे रामजी ! नहीं कह सकता कि सच है या झूठ, पर कोई-कोई मुझे आपहीका (दास) कहते हैं और मैं भी अपनेको आप- हीका कहलवाता हूँ। अतः हे देव ! अब आप अपने बानेकी लाज करके इस सेवक तुलसीको अपना लीजिये; बाँव (तरह) न दीजिये ॥४॥ विशेष १—'निरचि······बिहँगनि बझावौं'—बहेलिया पक्षियोंको फँसानेके लिए बाँसकी टट्टी बनाकर हरे पत्तोंसे छाता है; यहाँ हरिभक्तिका वेष, यानी तिलक- मुद्रा आदि ही टट्टी है और कपट अर्थात् ऊपर तो वैराग्यके चिह्न और अन्त- करणमें विषय-कामना, यही हरे पत्ते हैं। यहाँ संसारको सुनानेके लिए राम- नामका जप ही लग्गी है और ललित वचन ही लासा है। [२०९] नाहिनै नाथ ! अवलंब मोहिं आन की ! करम-मन-वचन पन सत्य करुनानिधे, एक गति राम ! भवदीय पदत्रान की ॥१॥ कोह-मद-मोह-ममतायतन जानि मन, बात नहिं जात कहि ग्यान-बिग्यान की । काम-संकलप उर निरखि बहु बासनहिं, आस नहिं एक हू आँख निरबान की ॥२॥ बेद-बोधित करम धरम बिनु अगम अति, जदपि जिय लालसा अमरपुर जान की।
विनय-पत्रिका : ३५१ सिद्ध-सुर-मनुज-दनुजादि सेवत कठिन, द्रवहिं हठजोग दिये भोग बलि प्रान की ॥३॥ भगति दुर्लभ परम, संभु-सुक-मुनि-मधुप, प्यास पदकंज-मकरंद-मधुपान की। पतित-पावन सुनत नाम बिस्राम-कृत, भ्रमित पुनि समुझि चित ग्रंथि अभिमान की ॥४॥ नरक-अधिकार मम घोर संसार-तम- कूपकहिं, भूप ! मोहिं सक्ति आपान की। दास तुलसी सोउ त्रास नहिं गनत मन, सुमिरि गुह गीध गज ग्याति हनुमान की ॥५॥ शब्दार्थ—भवदीय = आपके। पदत्रान = जूता। आँक = अंश। कूपकहिं = कुएँमें। आपानकी = आपकी। ग्याति = (ज्ञाति) जाति। भावार्थ—हे नाथ ! मुझे दूसरेका अवलम्ब नहीं है। हे करुणानिधे ! मन, वचन और कर्मसे मेरी यह सत्य प्रतिज्ञा है कि मुझे केवल आपकी पनहीका सहारा है ॥१॥ मैं जानता हूँ कि मेरा मन क्रोध, मद, मोह और ममताका घर है; इसीसे मैं ज्ञान-विज्ञानकी बातें नहीं कह सकता। हृदयमें अनेक तरहकी कामनाओंके संकल्पों और वासनाओंको देखकर किसी भी अंशमें मुझे मोक्षकी आशा नहीं है (क्योंकि वासनाओंके आत्यन्तिक लयका नाम ही मोक्ष है, किन्तु वासनाएँ बनी हुई हैं, इसलिए मुक्ति नहीं हो सकती) ॥२॥ यद्यपि वेदोक्त कर्म- धर्मके बिना (स्वर्ग-प्राप्ति) अत्यन्त कठिन है, फिर भी मेरे हृदयमें स्वर्गमें जानेकी लालसा है। इसके सिवा सिद्ध, देवता, मनुष्य एवं राक्षसोंकी सेवा करना बहुत कठिन है। क्योंकि ये लोग हठयोग करने और प्राणोंकी बलि देकर भोग चढ़ाने- से पिघलते हैं (किन्तु यह मेरा किया नहीं हो सकता) ॥३॥ रही भक्ति, सो वह बहुत ही दुर्लभ वस्तु है; क्योंकि आपके चरणारविन्दके मधुर परागको पान करनेके लिए शिव, शुकदेव तथा (अन्यान्य बड़े-बड़े) मुनिरूपी भौंरे प्यासे रहते हैं (ऐसी दशामें मेरे जैसे अकिंचनको वह कैसे मिल सकता है ?)। मैंने सुना है कि आपका नाम पतितोंको पवित्र करनेवाला तथा शान्ति देनेवाला है; फिर भी
३५२ विनय-पत्रिका चित्तमें अभिमानकी गाँठ पड़ी रहनेके कारण समझ-बूझकर भ्रममें पड़ जाता हूँ ॥४॥ हे राजन् ! घोर संसाररूपी अन्धकूपमें पड़ा हुआ मैं (सब तरहसे) नरक- का ही अधिकारी हूँ। यदि मुझे किसी बातका बल है, तो बस आपहीका । (आपहीके भरोसे) यह तुलसीदास निषाद, गीध और हनुमान्की जातिका स्मरण करके अपने मनमें उसका (संसारान्धकूप या नरकमें पड़नेका) भी भय नहीं मानता ॥५॥ विशेष १—'गुह'—निषाद; १०६ पदके विशेषमें देखिये । २—'गीध'—२१५ पदके विशेषमें देखिये । ३—'गज'—८३ पदके विशेषमें देखिये । [२१०] और कहँ ठौर रघुवंस - मनि ! मेरे । पतित-पावन प्रनत-पाल असरन - सरन, बाँकुरे बिरद बिरुदैत केहि केरे ॥१॥ समुझि जिय दोस अति रोस करि राम जो, करत नहिं कान बिनती बदन फेरे । तदपि है निडर हौं कहौं करुना-सिन्धु, क्यौंडव रहि जात सुनि बात बिनु हेरे ॥२॥ मुख्य रुचि होत बसिबेकी पुर रावरे, राम ! तेहि रुचिहि कामादि गन घेरे । अगम अपबर्ग, थरु सर्ग सुकृतैकफल, नाम - बल क्यों बसौं जम-नगर नेरे ॥३॥ कतहुँ नहिं ठाउँ, कहँ जाउँ कोसलनाथ ! दीन बितहीन हौं, बिकल बिनु डेरे । दास तुलसिहिं बास देहु अब करि कृपा, बसत गज गीध ब्याधादि जेहि खेरे ॥४॥
विनय-पत्रिका ३५३ शब्दार्थ—क्योंऽब = क्यों + अब। अपबर्ग = मोक्ष। नेरे = निकट, पास। डेरे = डेरा, स्थान। खेरे = गाँवमें। भावार्थ—हे रघुवंशमणि ! मेरे लिए और कहाँ ठिकाना है। आप पापियों- को पवित्र करनेवाले एवं अशरण-शरण हैं। आपका-सा बाँका या निराला बाना किस बानेवालेका है? ॥१॥ हे रामजी ! यद्यपि आप मेरे अपराधोंको अपने हृदयमें समझकर अत्यन्त क्रोध करनेके कारण मेरी विनतीपर ध्यान नहीं दे रहे हैं और मेरी ओरसे मुँह फेरे हुए हैं, तथापि हे करुणा-सागर ! मैं निडर होकर कहता हूँ कि मेरी बात सुनकर मेरी ओर देखे बिना आपसे कैसे रहा जाता है? ॥२॥ मुख्य बात यह है कि आपके पुरमें बसनेकी मेरी रुचि होती है; किन्तु हे रामजी ! उस रुचिको कामादि गणोंने घेर लिया है। मोक्ष दुर्लभ है और स्वर्ग भी एकमात्र पुण्यका फल है; नामके बलसे यमपुरीके निकट भी मैं कैसे जा सकता हूँ? तात्पर्य यह कि मोक्ष, स्वर्ग तथा नरक किसीका भी मैं अधि- कारी नहीं ॥३॥ हे कोशलेन्द्र ! मुझे कहीं भी ठौर नहीं; कहाँ जाऊँ? मैं गरीब और निर्धन हूँ, कोई स्थान न रहनेके कारण व्याकुल हो रहा हूँ नाथ ! अब आप कृपा करके इस सेवक तुलसीको उस गाँवमें रहनेकी जगह दीजिये, जहाँ गजेन्द्र, गीध और व्याध आदि रहते हैं ॥४॥ विशेष १—'करुना-सिन्धु'—कहनेका यह भाव है कि आप तो करुणा-सागर हैं, फिर मुझपर करुणा किये बिना आपसे कैसे रहा जाता है? २—'गज'—८३ पदके विशेषमें देखिये। ३—'गीध'—१२५ पदके विशेषमें देखिये। ४—'व्याध'—१४ पदके विशेषमें देखिये। ५—'व्याधादि'—इसमें 'आदि' शब्द शबरी, गणिका, अजामिल वगैरहके लिए आया है। [ २११ ] कबहुँ रघुवंस-मनि ! सो कृपा करहुगे। जेहि कृपा व्याध, गज, विप्र, खल नर तरे, तिन्हहिं सम मानि मोहिं नाथ उद्धरहुगे ॥१॥ २३
३५४ विनय-पत्रिका जोनि बहु जनमि किये करम खल बिबिध बिधि, अधम चाचरन कछु हृदय नहिं धरहुगे। दीन हित अजित सरबग्य समरथ प्रनत- पाल चित मृदुल निज गुननि अनुसरहुगे ॥२॥ मोह मद मान कामादि खल-मंडली सकुल निरमूल करि दुसह दुख हरहुगे। जोग-जप-जग्ग बिग्यान ते अधिक अति, अमल दृढ़ भगति दै परम सुख भरहुगे ॥३॥ मंदजन-मौलिमनि सकल साधन-हीन, कुटिल मन मलिन जिय जानि जो डरहुगे। दास तुलसी बेद-बिदित बिरुदावली बिमल जस नाथ ! केहि भाँति बिस्तरहुगे ॥४॥ शब्दार्थ—विप्र = ब्राह्मण, अजामिल । मृदुल = कोमल । मौलिमनि = शिरोमणि । कुटिल = दुष्ट, विकारी । मलिन = पापी । बिरुदावली = गुणावली । भावार्थ—हे रघुवंशमणि ! क्या कभी आप मुझपर वह कृपा करेंगे जिस कृपासे व्याध, गजेन्द्र, अजामिल आदि दुष्ट मनुष्य तरे थे ? हे नाथ ! क्या आप उन लोगोंके समान मुझे भी मानकर मेरा उद्धार करेंगे ? ॥१॥ बहुतसी योनियोंमें जन्म लेकर मैंने नाना प्रकारके दुष्ट कर्म किये हैं; किन्तु आप मेरे नीच आचरण- को हृदयमें न लाइयेगा । आप दीनोंके हितू, अजेय, सर्वज्ञ, सामर्थ्यवान और प्रणतपाल हैं ! क्या आप अपने कोमल चित्तसे अपने (इन नामोंके) गुणोंका अनुसरण करेंगे ? अर्थात् आप दीनोंके हितू हैं, अतः क्या मुझ दीनका हित न करेंगे ? आप अजेय हैं, अतः क्या मेरे काम-क्रोधादि शत्रुओंको परास्त न करेंगे ? आप सर्वज्ञ हैं, अतः क्या मेरे हृद्गत भावोंको न समझेंगे ? आप समर्थ हैं, अतः क्या मुझ अधर्मीको अपने सामर्थ्यसे न तारेंगे ? आप प्रणतपाल हैं, अतः क्या मुझ शरणागतका पालन न करेंगे ? ॥२॥ क्या आप (मेरे हृदय-स्थित) मोह, मद, मान, काम आदि दुष्टोंकी मण्डलीको उनके परिवार-सहित समूल नष्ट करके मेरे असह्य दुःखोंको दूर करेंगे ? क्या आप योग, जप, यज्ञ और
विनय-पत्रिका ३५५ विज्ञानकी अपेक्षा अत्यधिक निर्मल अपनी दृढ़ भक्ति (अनन्य भक्ति) देकर मेरे हृदयमें परमानन्द भरेंगे ? ॥३॥ यदि आप अपने हृदयमें इस तुलसीदासको मन्द पुरुषोंका शिरोमणि, सब प्रकारके साधनोंसे हीन, कुटिल मनवाला और मलिन समझकर डरेंगे (कि इतने बड़े पातकीका उद्धार करनेसे लोक-निन्दा होगी), तो हे नाथ ! आप वेद-विख्यात अपनी विरुदावली और विमल यशका विस्तार किस प्रकार करेंगे ? ॥४॥ विशेष १—'सकुल'—झूठ बोलना, छल-कपट, निन्द्य कर्म आदि ही काम-क्रोधादि खलोंके परिवार हैं । क्योंकि कामादिसे ही उक्त दुर्गुणोंकी उत्पत्ति होती है । २—'व्याध'—९४ पदके विशेषमें देखिये । ३—'गज'—२१५ पदके विशेषमें देखिये । ४—'विप्र'—अजामिल; ५७ पदके विशेषमें देखिये । राग केदारा [ २१२ ] रघुपति विपति-दवन । परम कृपालु, प्रनत-प्रतिपालक, पतित-पवन ॥१॥ कूर, कुटिल, कुलहीन, दीन, अति मलिन जवन । सुमिरत नाम राम पठये सब अपने भवन ॥२॥ गज-पिंगला-अजामिल से खल गनै धौं कवन । तुलसिदास प्रभु केहि न दीन्हि गति जानकी-रवन ॥३॥ शब्दार्थ—दवन = दमन, नाश करनेवाले । पवन = पवित्र करनेवाला । जवन = जो । भावार्थ—श्रीरघुनाथजी विपत्तियोंका नाश करनेवाले हैं। वह बड़े ही
३५६ विनय-पत्रिका कृपालु, दीनोंको पालनेवाले तथा पापियोंको पवित्र करनेवाले हैं ॥१॥ क्रूरों, दुष्टों, नीचों, गरीबों और अत्यन्त मलिन या पापियोंको भी नामका स्मरण करते ही रामजीने अपने धाममें भेज दिया ॥२॥ गजेन्द्र, पिंगला बेश्या तथा अजामिल आदि दुष्टोंकी गणना कौन कर सकता है ? (थोड़ेमें यों कहा जा सकता है कि) तुलसीदासके प्रभु जानकी-वल्लभ श्रीरामजीने किसे मुक्त नहीं कर दिया ? ॥३॥ विशेष १—'पवन'—वियोगी हरिजीने लिखा है, “पवन=पवित्र करनेवाला; शुद्ध शब्द 'पावन' है । यह आर्ष प्रयोग है।” किन्तु वास्तवमें 'पवन' शुद्ध संस्कृत शब्द है, आर्ष प्रयोग नहीं है। यह 'पूञ् पवने' धातुसे बना है। इसका अर्थ है 'पवित्र करनेवाला'। इसीसे वायुको भी पवन कहते हैं। क्योंकि वायुसे सब वस्तुएँ पवित्र होती हैं।—मेदिनी कोषमें भी लिखा है, 'कुम्भकारस्य आमघटादिपाकस्थानम्, पवित्रीकरणं च' अर्थात् कुम्भारके घड़ा आदि बर्तन पकानेका स्थान 'आवाँ' । २—'जवन'—इसका अर्थ पतित 'यवन' भी हो सकता है। इसका इतिहास पीछे लिखा जा चुका है। ४६ पदके विशेषमें देखिये। ३—'गज'—२१५ पदके विशेषमें देखिये। ४—'पिंगला'—९४ पदके विशेषमें देखिये। ५—'अजामिल—५७ पदके विशेषमें देखिये। [ २१३ ] हरि-सम आपदा-हरन । नहिं कोउ सहज कृपालु दुसह दुख-सागर-तरन ॥१॥ गज निज बल अवलोकि कमल गहि गयो सरन । दीन बचन सुनि चले गरुड़ तजि सुनाभ-धरन ॥२॥
विनय-पत्रिका ३५७ द्रुपदसुता को लग्यो दुसासन नगन करन । 'हा हरि पाहि' कहत पूरे पट बिबिध बरन ॥३॥ इहै जानि सुर-नर-मुनि-कोबिद् सेवत चरन । तुलसिदास प्रभुको अभय कियो नृग-उद्धरन ॥४॥ शब्दार्थ—सुनाभ = चक्रसुदर्शन । कोबिद = पण्डित, ज्ञानी । नृग = एक राजाका नाम, राजा नृग । भावार्थ—भगवान्के समान आपदाओंको हरनेवाला, स्वाभाविक कृपालु तथा असह्य दुःख-सागरसे पार करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ॥१॥ जब गजेन्द्रने अपना बल देखकर (अपने बलकी परीक्षा कर चुकनेके बाद) कमल-पुष्प लेकर आपकी शरणमें पहुँचा, तब आप उसके दीन वचन सुनते ही चक्रसुदर्शन लेकर गरुड़को छोड़ (पैदल ही) चल पड़े ॥२॥ जब दुःशासन द्रौपदीको (भरी सभामें) नग्न करने लगा, तब उसके 'हा प्रभो ! रक्षा करो' कहते ही अनेक रंगकी साड़ियोंसे उसे पूर्ण कर दिया—उसकी लाज बचायी ॥३॥ यही सब जानकर देवता, मनुष्य, मुनि और पण्डित आपके चरणोंकी सेवा करते हैं । राजा नृगका उद्धार करनेवाले तुलसीदासके स्वामीने किसको अभय नहीं किया ? (जो कोई भी उनकी शरणमें गया, सबको निर्भय कर दिया) ॥४॥ विशेष १—'सुनाभ'—कुछ टीकाकारोंने इसका अर्थ 'नाभि' लिखा है; किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं जँचता । २—'गज'—२१५ पदके विशेषमें देखिये । ३—'द्रुपदसुता'—९३ पदके विशेषमें देखिये । ४—'नृग'—सत्ययुगमें राजा नृग बड़े दानी थे । प्रतिदिन एक करोड़ गोदान करनेका उनका नियम था। एक बार उनकी गायोंमें भूलसे एक ऐसी गाय आ मिली, जिसे वह एक बार किसी ब्राह्मणको दे चुके थे । राजाने उसे पहचाना नहीं, और दूसरे ब्राह्मणको दे दिया । पहला ब्राह्मण अपनी गायका
३५८ विनय-पत्रिका पता लगाकर उस ब्राह्मणके पास पहुँचा और उसे चोर समझकर गायके लिए झगड़ा करने लगा । अन्तमें दोनों राजाके पास गये । राजाके राजी करनेपर भी वे दोनों ब्राह्मण राजी नहीं हुए और गाय छोड़कर यह शाप देते हुए चले गये कि 'तुमने हमें धोखा दिया है, इसलिए तुम गिरगिट हो जाओ । विप्रका शाप सत्य हुआ । बेचारे राजा बहुत दिनोंतक, द्वारकाके एक कुएँमें पड़े रहे। कहा भी है, 'कोटि गऊराजा नृग दीन्हें तेउ भव-कूप परे ।' भगवान्ने कृष्णावतारमें उस गिरगिटको कुएँसे निकाला और दिव्य शरीर देकर वैकुण्ठमें भेज दिया । राग कल्याण [ २१४ ] ऐसी कौन प्रभुकी रीति ? बिरद हेतु पुनीत परिहरि पाँवरनि पर प्रीति ॥१॥ गई मारन पूतना कुच कालकूट लगाइ । मातु की गति दई ताहि कृपालु जादवराइ ॥२॥ काम-मोहित गोपिकनि पर कृपा अतुलित कीन्ह । जगत-पिता विरंचि जिन्हके चरनकी रज लीन्ह ॥३॥ नेम तें सिसुपाल दिन प्रति देत गनि गनि गारि । कियो लीन सु आपुमें हरि राज-सभा मँझारि ॥४॥ ब्याध चित दै चरन माऱ्यो मूढ़मति मृग जानि । सो सदेह स्वलोक पठयो प्रगट करि निज बानि ॥५॥ कौन तिन्हकी कहै जिन्हके सुकृत अरु अघ दोउ । प्रगट पातकरूप तुलसी सरन राख्यो सोउ ॥६॥ शब्दार्थ—पाँवरनि = नीचों । कुच = स्तन । कालकूट = विष । जादवराइ = श्रीकृष्ण मँझारि = बीचमें । चित दै = निशाना साधकर । बानि = आदत, स्वभाव । भावार्थ—ऐसी रीति और किस प्रभुकी है जो अपने बाने (की लाज रखने) के लिए पवित्र पुरुषों (ऋषियों) को छोड़कर नीचों (शबरी, चांडाल आदि) पर प्रेम करता हो ? ॥१॥ पूतना अपने स्तनोंमें विष लगाकर मारने
विनय-पत्रिका ३५९ गयी, किन्तु परम कृपालु भगवान् श्रीकृष्णने उसे माताके समान गति दी (स्वर्गमें भेज दिया) ॥२॥ आपने काम-मोहित गोपियोंपर ऐसी कृपा की थी जिसकी तुलना नहीं की जा सकती, और जिसके कारण जगत्-पिता ब्रह्माने भी उनका (गोपियोंका) चरण-रज लिया ॥३॥ शिशुपाल नियम बाँधकर प्रतिदिन भगवान्- को गिन-गिनकर गालियाँ दिया करता था; किन्तु प्रभुने राज-सभाके बीचमें उसे अपनेमें लीन कर लिया (मारकर मुक्त कर दिया) ॥४॥ मूढ़ बुद्धि व्याधने मृग जानकर निशाना साधकर आपके चरणमें बाण मारा, पर आपने उसे सदेह अपने लोकमें भेजकर अपने (दयालु) स्वभावका परिचय दिया ॥५॥ किन्तु उन लोगोंकी बात कौन कहे जिन लोगोंके पुण्य और पाप दोनों थे (अर्थात् जिन लोगोंने पुण्य और पाप दोनों किये थे ); आपने तो अपनी शरणमें इस तुलसीदासको भी रख लिया जो प्रत्यक्ष पापकी मूर्ति है ॥६॥ विशेष १—आजकलके अधिकांश उपासक भगवान्के अवतारोंमें भेद मानते हैं, किन्तु शास्त्रोंके सिद्धान्तोंपर विचार करनेवाले गुसाईंजीकी इस पदमें अभेद दृष्टि दिखाई पड़ती है । गुसाईंजीकी रचनाओंमें इस प्रकार अभेदकी झलक कई जगह दिखाई पड़ती है । २—'पूतना'—पूर्वजन्ममें एक अप्सरा थी । भगवान् वामनका बाल- स्वरूप देखकर उसे इच्छा हुई कि स्नेहपूर्वक इस बालकको स्तन पिलाऊँ । अन्तमें वह किसी घोर पापके कारण राक्षसी हुईं । कृष्ण भगवान्के मामा कंसने स्तनका दूध पिलाकर अविनाशी भगवान् कृष्णको मार डालनेके लिए उसे भेजा था । किन्तु दयालु परमात्माने उसकी बुरी नीयतपर ध्यान नहीं दिया और उसकी पूर्वजन्मकी अभिलाषा पूरी की । ३—'काम-मोहित'—इससे यह न समझना चाहिये कि ब्रजांगनाएँ कुलटा थीं, और भगवान् श्रीकृष्ण उनके साथ रमण करते थे । आजकल लोगोंकी ऐसी ही भ्रान्त धारणा हो गयी है, और पुराणोंके अच्छे-अच्छे संस्कृत टीका- कारोंने श्रीमद्भागवतके दशमस्कंध रासपंचाध्यायीपर इसी दृष्टिकोणसे टीका भी की है । किन्तु यथार्थतः न तो उसका वह अर्थ है और न वह संगत ही प्रतीत
३६० विनय-पत्रिका होता है। सोचिये न ! कृष्णजी पूर्णावतार माने जाते हैं। अवतार हुआ करता है, अधर्मका नाश करके धर्मकी स्थापना करनेके लिए। यह स्वयं सिद्ध है कि कृष्ण पूर्णावतार थे। उनके पूर्णत्वमें किसी तरहका सन्देह नहीं। जिस बातको वेद-शास्त्र एक स्वरसे कह रहे हैं, जिसकी पुष्टि बड़े-बड़े तत्त्ववेत्ता ऋषि-मुनिँ कर गये हैं, उस बातका खंडन कोई भी आस्तिक बुद्धि नहीं कर सकती। और फिर कृष्ण भगवान्के प्रत्येक कार्यपर सूक्ष्म बुद्धिसे विचार करनेपर भी यही प्रतीत होता है कि वह पूर्णावतार थे। इस बातको अच्छी तरह समझनेके लिए हमें श्रीमद्भागवतकी उत्पत्तिपर विचार करना होगा। देखिये, शापवश राजा परीक्षित्के जीवनकी अवधि केवल सात दिन रह गयी थी। उस समय उन्होंने अपने उद्धारके लिए श्रीमद्भागवतकी कथा सुनी थी। आचार्य चुने गये थे, बालब्रह्मचारी महामुनि शुकदेवजी। अब विचारणीय बात है कि क्या श्रृंगार- प्रधान केलि-कलहपूर्ण कथा सुनकर राजा परीक्षित् मुक्त हो सकते थे? कदापि नहीं। और फिर यदि श्रृंगार-रसकी ही कथा अभिप्रेत होती, तो उसके लिए बालब्रह्मचारी शुकदेवजी उपयुक्त आचार्य क्यों चुने जाते? एक बालब्रह्मचारी वैषयिक बातोंका वर्णन क्या करेगा? इन बातोंसे यह सिद्ध होता है कि श्रीमद्भागवतकी कथा केलि-कलहपूर्ण नहीं है। ब्रजांगनाओंके पवित्र भावका पता एक बातसे और चलता है; श्रीमद्भागवतमें राजा परीक्षित्ने ब्रह्मर्षि शुकदेवजीसे प्रश्न किया कि गोपियोंके काम-मोहित होनेपर भी उन्हें परम-पद कैसे मिला? इसके उत्तरमें महर्षिने कहा कि जिन गोपिकाओंने समस्त संसारको, यहाँतक कि अपने परम प्रिय जीवनको भी भगवान् श्रीकृष्ण- पर न्यौछावर कर दिया और उनसे निष्काम प्रीति की, वे काम-मोहित कैसे कही जा सकती हैं? स्थानाभावके कारण यहाँ उस विषयका विवेचन विस्तृत रूपसे नहीं किया जा सकता। यदि ईश्वरकी कृपा हुई तो मैं इस विषयपर एक स्वतन्त्र पुस्तक लिखूँगा। अब यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि गुसाईंजीने ब्रजांगनाओंको काम- मोहित क्यों कहा? बात यह है कि अन्य-अन्य अवतारोंमें (जैसे रामावतार आदिमें, सूपर्णखा आदि) स्त्रियाँ भगवान्के रूप-माधुर्यपर मुग्ध होकर उन्हें पतिरूपमें अथवा प्रेमीके रूपमें देखना चाहती थीं और भगवान्ने अपने
विनय-पत्रिका ३६१ कृष्णावतारमें उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेका वचन दिया था। (जाकी रही भावना जैसी। प्रभु-मूरति देखी तिन तैसी) किन्तु परमात्माकी प्रेरणासे वे ही कामा- तुर स्त्रियाँ जब गोपियोंके रूपमें उत्पन्न हुईं, तब उनका वह भाव नहीं रह गया। उनमें शुद्ध प्रेम उत्पन्न हो गया। यह है ईश्वर-साक्षात्कारकी महिमा। इससे व्रजांगनाओंका प्रेम सखा-भावमय हो गया। जान पड़ता है कि उसी बातको लक्ष्य करके गुसाईंजीने, यहाँ 'काम-मोहित' लिखा है। अर्थात् गोपिकाएँ तो काम-मोहित होकर अवतरित हुई थीं, पर भगवान्ने कृपा करके उनका भाव ही पलट दिया। वास्तवमें व्रजांगनाएँ धन्य हो गयीं। उनके भाग्यकी जितनी प्रशंसा की जाय, थोड़ी है। कविवर रसखानने क्या खूब कहा है:— संकरसे मुनि जाहिं रटैं, चतुरानन आनन चार तें गावैं। सो हिय नैक हि आवत ही, मति-मूढ़ महा 'रसखानि' कहावैं। जापर देव अदेव भुजंगम, बारन प्रानन बार न लावैं। ताहि अहीरकी छोहरियाँ छछियाँ भरि छाँछको नाच नचावैं ॥ —रसखान । ४—'सिसुपाल'—यह चेदि देशका राजा था। आजकल चेदि नगरको चंदेरी कहते हैं जोकि ग्वालियर राज्यके अन्तर्गत है। यह कृष्ण भगवान्को प्रतिदिन सौ गालियाँ दिया करता था। यह कृष्णकी बुआका लड़का था। भगवान् अपनी बुआको वचन दे चुके थे कि शिशुपालकी सौ गालियाँतक मैं सह लूँगा। एक दिन पाण्डवोंकी राज्य-सभामें जब शिशुपाल सौसे अधिक गालियाँ देने लगा, तब भगवान्ने चक्रसुदर्शनसे उसका सिर काट लिया। देखते ही देखते उसकी आत्म-ज्योति भगवान्के श्रीमुखमें प्रवेश कर गयी। ५—'ब्याध'—'जरा' नामक ब्याधकी कथा पीछे लिखी जा चुकी है। इसने पूर्वजन्मका बदला चुकानेके लिए धोखेसे श्रीकृष्णके चरणमें बाण मार दिया था। ९४ पदके विशेषमें देखिये। [२१५] श्री रघुवीर की यह बानी । नीचहूँ सों करत नेह सुप्रीति मन अनुमानी ॥१॥
३६२ विनय-पत्रिका परम अधम निषाद पाँवर, कौन ताकी कानि ? लियो सो उर लाइ सुत ज्यों प्रेमको पहिचानि ॥२॥ गीध कौन दयालु, जो बिधि रच्यो हिंसा सानि ? जनक ज्यों रघुनाथ ता कहँ दियो जल निज पानि ॥३॥ प्रकृति-मलिन कुजाति सबरी सकल अवगुन-खानि । खात ताके दिये फल अति रुचि बखानि बखानि ॥४॥ रजनिचर अरु रिपु विभीषन सरन आयो जानि । भरत ज्यों उठि ताहि भेंटत देह-दसा भुलानि ॥५॥ कौन सुभग सुसील बानर, जिनहिं सुमिरत हानि । किये ते सब सखा पूजे भवन अपने आनि ॥६॥ राम सहज कृपालु कोमल दीनहित दिनदानि । भजहि ऐसे प्रभुहि तुलसी कुटिल कपट न ठानि ॥७॥ शब्दार्थ—पाँवर = नीच, पापी। कानि = प्रतिष्ठा। सानि = सानकर। जनक = पिता। आनि = लाकर। दिनदानि = सदैव दानी। भावार्थ—श्रीरघुनाथजीकी यह आदत है कि वह अपने मनमें सुन्दर प्रेमका अनुमान करके नीचसे भी प्रेम करते हैं ॥१॥ निषाद अत्यन्त अधम और पापी था। उसकी कौनसी प्रतिष्ठा थी ? किन्तु उसके प्रेमको पहचानकर रामजीने उसे पुत्रके समान हृदयसे लगा लिया ॥२॥ गीध कौनसा दयालु था जिसे ब्रह्मा- ने हिंसा में सानकर (हिंसामय) बनाया था ? किन्तु रामजीने पिताके समान उसे अपने हाथसे पानी दिया ॥३॥ स्वभावकी मलिन और नीच जातिकी शबरी सब अवगुणोंकी खान थी। किन्तु रामजीने उसके दिये हुए फलोंको बड़ी रुचिके साथ बखान-बखानकर खाया ॥४॥ राक्षस और शत्रु विभीषणको शरणमें आया जानकर आपने उठकर उसे भरतकी तरह हृदयसे लगा लिया और (प्रेमकी अधि- कताके कारण) अपने शरीरकी भी सुध भूल गये ॥५॥ बन्दर भला कौनसे सुन्दर और सुशील होते हैं जिनका स्मरण करनेसे भी हानि होती है। किन्तु रामजीने उन बन्दरोंको अपना सखा बनाया था और अपने घर लाकर उनकी पूजा भी की थी (आदर-सत्कार किया था) ॥६॥ रामजी सहज कृपाल,
कोमल, दीन-हितकारी और सदैव दान देनेवाले हैं। इसलिए हे तुलसीदास ! तू कुटिलता और कपट न रखकर ऐसे प्रभु (श्री रामजी) का भजन कर ॥७॥
विशेष
१—'निषाद'—१०६ पदके विशेषमें देखिये । २—'गीध'—जटायु; इसने सीताको छुड़ानेके लिए रावणसे युद्ध करके प्राण-त्याग किया था। रामजीने अपने पिताके समान, इसका दाह-संस्कार किया था। ३—'सबरी'—१०६ पदके विशेषमें देखिये ।
[ २१६ ]
हरि तजि और भजिये काहि ? नाहिनै कोउ राम सो ममता प्रनत पर जाहि ॥१॥ कनककसिपु बिरंचि को जन करम मन अरु बात । सुतहि दुखवत विधि न बरज्यो काल के घर जात ॥२॥ संभु-सेवक जान जग, बहु बार दिय दससीस । करत राम-विरोध सो सपनेहुँ न हरक्यो ईस ॥३॥ और देवन की कहा कहौं, स्वारथहि के मीत । कबहुँ काहु न राखि लियो कोउ सरन गयउ सभीत ॥४॥ को न सेवत देत संपति लोकहू यह रीति । दास तुलसी दीनपर एक राम ही की प्रीति ॥५॥ शब्दार्थ—कनककसिपु = हिरण्यकशिपु । हरक्यो = मना किया । ईस = शिवजी । भावार्थ—परमात्माको छोड़कर और किसका भजन किया जाय । रामजी- की तरह ऐसा कोई नहीं है, जिसकी भक्तोंपर ममता हो ॥१॥ हिरण्यकशिपु मन, वचन और कर्मसे ब्रह्माका भक्त था। वह अपने पुत्र (प्रह्लाद) को दुःख पहुँचाने- के कारण, कालके घर चला गया, पर ब्रह्मा उसे न रोक सके (मृत्युसे न बचा सके) ॥२॥ संसार जानता है कि रावण शिवजीका भक्त था और उसने कई बार अपने सिर काटकर शिवजीको चढ़ाये थे। किन्तु जब वह रामजीसे वैर करने
३६४ विनय-पत्रिका लगा, तब शिवजीने उसे स्वप्नमें भी मना नहीं किया (परिणाम यह हुआ कि रावण मारा गया और शिवजीने उसकी रक्षा नहीं की) ॥३॥ (जब ब्रह्मा और शिवका यह हाल है, तब) और देवताओंके लिए क्या कहूँ, सब अपने मतलबके यार हैं। कभी भी किसीके भयभीत होकर शरणमें आनेपर उसे किसीने शरण नहीं दी ॥४॥ सेवा करनेपर कौन धन नहीं देता ? (सब लोग देते हैं)। यही संसारकी रीति है। किन्तु हे तुलसीदास ! दीन भक्तोंपर एक रामजीका ही (सच्चा) प्रेम है (अर्थात् रामजी ही अपने भक्तोंकी हर हालतमें रक्षा करते हैं) ॥५॥ विशेष १—‘कनककसिपु’—९३ पदके विशेषमें देखिये। २—‘हरक्यो’—प्रायः सभी प्रतियोंमें ‘हटक्यो’ पाठ है। किन्तु एक हस्त- लिखित प्रतिमें मुझे ‘हरक्यो’ पाठ मिला है। यही पाठ शुद्ध भी जान पड़ता है। [ २१७ ] जो पै दूसरो कोउ होइ । तौ हौं बारहि बार प्रभु कत दुख सुनावौं रोइ ॥१॥ काहि ममता दीन पर, काको पतित-पावन नाम । पाप मूल अजामिलहि केहि दियो अपनो धाम ॥२॥ रहे संभु बिरंचि सुरपति लोकपाल अनेक । सोक-सरि बूड़त करीसहि दई काहु न टेक ॥३॥ बिपुल-भूपति-सदसि महँ नर-नारि कह्यो ‘प्रभु पाहि’ । सकल समरथ रहे, काहु न बसन दीन्हों ताहि ॥४॥ एक मुख क्यों कहौं करुनासिन्धु के गुन-गाथ ? । भक्तहित धरि देह काहू न कियो कोसलनाथ ! ॥५॥ आप से कहुँ सौंपिये मोहि जो पै अतिहि घिनात । दासतुलसी और बिधि क्यों चरन परिहरि जात ॥६॥ शब्दार्थ—करीसहि (करि+ईसहिं) = गजेन्द्रको । टेक = सहारा । सदसि = सभा । नर = अर्जुन । घिनात = घृणा करते हो ।
विनय-पत्रिका ३६५ भावार्थ—हे नाथ ! यदि दूसरा कोई (आपके समान) होता, तो मैं बार- बार रोकर अपना दुःख आपहीको क्यों सुनाता ? ॥१॥ (आपके सिवा) दीनों- पर किसकी स्नेह-ममता है, और पतित-पावन किसका नाम है ? महापापी अजा- मिलको किसने अपना धाम दिया ? ॥२॥ शिव, ब्रह्मा, इन्द्र और अनेक लोक- पाल थे, पर शोकरूपी नदीमें डूबते हुए गजेन्द्रको किसीने सहारा नहीं दिया॥३॥ सभामें बहुतसे रजवाड़े बैठे थे और सभी अपने-अपनेको समर्थ थे, किन्तु जब अर्जुनकी स्त्री द्रौपदीने कहा, 'प्रभो ! मेरी रक्षा करो'—तब किसीने उसे वस्त्र नहीं दिया (यदि उसकी साड़ी बढ़ायी, तो आपहीने ।) ॥४॥ मैं करुणा- निधान भगवान् रामजीकी गुग-गाथा एक मुखसे कैसे कहूँ ? हे कोशलनाथ ! आपने भक्तोंके लिए अवतार लेकर क्या-क्या नहीं किया ? ॥५॥ यदि आप मुझसे घृणा करते हों तो आप मुझे अपने ही समान किसी स्वामीको सौंप दीजिये । (यदि आप ऐसा न करेंगे तो) यह दास तुलसी आपके चरणोंको छोड़कर और किसी प्रकार भला अन्यत्र क्यों जाने लगा ? ॥६॥ विशेष १—'अजामिल'—५७ पदके विशेषमें देखिये । २—'करीस'—गजेन्द्र; ८३ पदके विशेषमें देखिये । ३—'नर-नारि'—द्रौपदी; ९३ पदके विशेषमें देखिये । २१८ ] कबहिं देखाइहौ हरि चरन । समन सकल कलेस कलि-मल, सकल मंगल-करन ॥१॥ सरद-भव सुंदर तरुनतर अरुन-बारिज बरन । लच्छि-लालित ललित करतल छवि अनूपम धरन ॥२॥ गंग-जनक अनंग-अरि-प्रिय कपट-बटु बलि-छरन । विप्रतिय नृग बधिक के दुख-दोस दारुन दरन ॥३॥ सिद्ध-सुर-मुनि-बृंद-बंदित सुखद सब कहँ सरन । सकृत उर आनत जिनहिं जन होत तारन तरन ॥४॥
कृपासिंधु सुजान रघुबर प्रनत-आरति हरन। दरस-आस-पियास तुलसीदास चाहत मरन ॥५॥ शब्दार्थ—तरुनतर = अत्यन्त युवक, ताजा खिला हुआ। ललित = दुलार किये गये। बटु = ब्रह्मचारी। बधिक = वाल्मीकि। भावार्थ—हे हरे! आप मुझे अपने उन चरणोंका दर्शन कब करायेंगे जो कलियुगके सब पापों और क्लेशोंका नाश करनेवाले तथा सब प्रकारसे कल्याणकारी हैं? ॥१॥ जो चरण शरद ऋतुमें उत्पन्न, सुन्दर और ताजा खिले हुए लाल कमलके रंगके हैं, जिनका लक्ष्मीजी अपनी ललित और अनुपम शोभा धारण करनेवाली हथेलियोंसे दुलार किया करती हैं ॥२॥ जो गंगाजीको उत्पन्न करनेवाले हैं, काम-रिपु शंकरजीके प्रिय हैं, तथा ब्रह्मचारीके कपट वेषमें राजा बलिको छलनेवाले हैं। जिन्होंने ब्राह्मण-पत्नी (अहिल्या), राजा नृग और बधिक-(वाल्मीकि) के दारुणदुःखों और दोषोंको दूर कर दिये ॥३॥ जो सिद्ध, देवता, मुनीन्द्र द्वारा वन्दित हैं तथा सबको सुख और शरण देनेवाले हैं; जिनका एक बार हृदयमें ध्यान करते ही मनुष्य स्वयं तरकर दूसरोंको तारनेवाला बन जाता है ॥४॥ हे रघुनाथजी! आप कृपाके समुद्र हैं और चतुर हैं। आप शरणागतोंका दुःख दूर करनेवाले हैं। यह तुलसीदास (आपके उन चरणोंके) दर्शनकी आशा-रूपी प्याससे मरना चाहता है! (यदि शीघ्रातिशीघ्र आपके चरणोंका दर्शन न मिलो, तो वह अवश्य मर जायगा) ॥५॥ विशेष १—'बिप्रतिय'—अहिल्या; ४३ पदके विशेषमें देखिये। २—'नृग'—२१३ पदके विशेषमें देखिये। ३—'बधिक'—इसका अर्थ वियोगी हरिजीने 'निषाद' लिखा है। किन्तु यहाँ एक तो यह अर्थ ठीक नहीं जँचता, दूसरे इसका सीधा-सादा अर्थ भी यह नहीं है। यों तो भक्तोंमें कुछ भी भेद नहीं है तथापि राजा नृग और अहिल्याकी श्रेणीमें बाल्मीकिका आना तथा शबरी, अजामिल एवं गणिकाकी श्रेणीमें निषादका आना अधिक उत्तम जँचता है। इसलिए यहाँ बधिकका अर्थ 'निषाद' नहीं बल्कि बाल्मीकि करना ही ठीक प्रतीत होता है।