विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५२ विनय-पत्रिका चित्तमें अभिमानकी गाँठ पड़ी रहनेके कारण समझ-बूझकर भ्रममें पड़ जाता हूँ ॥४॥ हे राजन् ! घोर संसाररूपी अन्धकूपमें पड़ा हुआ मैं (सब तरहसे) नरक- का ही अधिकारी हूँ। यदि मुझे किसी बातका बल है, तो बस आपहीका । (आपहीके भरोसे) यह तुलसीदास निषाद, गीध और हनुमान्की जातिका स्मरण करके अपने मनमें उसका (संसारान्धकूप या नरकमें पड़नेका) भी भय नहीं मानता ॥५॥ विशेष १—'गुह'—निषाद; १०६ पदके विशेषमें देखिये । २—'गीध'—२१५ पदके विशेषमें देखिये । ३—'गज'—८३ पदके विशेषमें देखिये । [२१०] और कहँ ठौर रघुवंस - मनि ! मेरे । पतित-पावन प्रनत-पाल असरन - सरन, बाँकुरे बिरद बिरुदैत केहि केरे ॥१॥ समुझि जिय दोस अति रोस करि राम जो, करत नहिं कान बिनती बदन फेरे । तदपि है निडर हौं कहौं करुना-सिन्धु, क्यौंडव रहि जात सुनि बात बिनु हेरे ॥२॥ मुख्य रुचि होत बसिबेकी पुर रावरे, राम ! तेहि रुचिहि कामादि गन घेरे । अगम अपबर्ग, थरु सर्ग सुकृतैकफल, नाम - बल क्यों बसौं जम-नगर नेरे ॥३॥ कतहुँ नहिं ठाउँ, कहँ जाउँ कोसलनाथ ! दीन बितहीन हौं, बिकल बिनु डेरे । दास तुलसिहिं बास देहु अब करि कृपा, बसत गज गीध ब्याधादि जेहि खेरे ॥४॥