विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३५३ शब्दार्थ—क्योंऽब = क्यों + अब। अपबर्ग = मोक्ष। नेरे = निकट, पास। डेरे = डेरा, स्थान। खेरे = गाँवमें। भावार्थ—हे रघुवंशमणि ! मेरे लिए और कहाँ ठिकाना है। आप पापियों- को पवित्र करनेवाले एवं अशरण-शरण हैं। आपका-सा बाँका या निराला बाना किस बानेवालेका है? ॥१॥ हे रामजी ! यद्यपि आप मेरे अपराधोंको अपने हृदयमें समझकर अत्यन्त क्रोध करनेके कारण मेरी विनतीपर ध्यान नहीं दे रहे हैं और मेरी ओरसे मुँह फेरे हुए हैं, तथापि हे करुणा-सागर ! मैं निडर होकर कहता हूँ कि मेरी बात सुनकर मेरी ओर देखे बिना आपसे कैसे रहा जाता है? ॥२॥ मुख्य बात यह है कि आपके पुरमें बसनेकी मेरी रुचि होती है; किन्तु हे रामजी ! उस रुचिको कामादि गणोंने घेर लिया है। मोक्ष दुर्लभ है और स्वर्ग भी एकमात्र पुण्यका फल है; नामके बलसे यमपुरीके निकट भी मैं कैसे जा सकता हूँ? तात्पर्य यह कि मोक्ष, स्वर्ग तथा नरक किसीका भी मैं अधि- कारी नहीं ॥३॥ हे कोशलेन्द्र ! मुझे कहीं भी ठौर नहीं; कहाँ जाऊँ? मैं गरीब और निर्धन हूँ, कोई स्थान न रहनेके कारण व्याकुल हो रहा हूँ नाथ ! अब आप कृपा करके इस सेवक तुलसीको उस गाँवमें रहनेकी जगह दीजिये, जहाँ गजेन्द्र, गीध और व्याध आदि रहते हैं ॥४॥ विशेष १—'करुना-सिन्धु'—कहनेका यह भाव है कि आप तो करुणा-सागर हैं, फिर मुझपर करुणा किये बिना आपसे कैसे रहा जाता है? २—'गज'—८३ पदके विशेषमें देखिये। ३—'गीध'—१२५ पदके विशेषमें देखिये। ४—'व्याध'—१४ पदके विशेषमें देखिये। ५—'व्याधादि'—इसमें 'आदि' शब्द शबरी, गणिका, अजामिल वगैरहके लिए आया है। [ २११ ] कबहुँ रघुवंस-मनि ! सो कृपा करहुगे। जेहि कृपा व्याध, गज, विप्र, खल नर तरे, तिन्हहिं सम मानि मोहिं नाथ उद्धरहुगे ॥१॥ २३