विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५४ विनय-पत्रिका जोनि बहु जनमि किये करम खल बिबिध बिधि, अधम चाचरन कछु हृदय नहिं धरहुगे। दीन हित अजित सरबग्य समरथ प्रनत- पाल चित मृदुल निज गुननि अनुसरहुगे ॥२॥ मोह मद मान कामादि खल-मंडली सकुल निरमूल करि दुसह दुख हरहुगे। जोग-जप-जग्ग बिग्यान ते अधिक अति, अमल दृढ़ भगति दै परम सुख भरहुगे ॥३॥ मंदजन-मौलिमनि सकल साधन-हीन, कुटिल मन मलिन जिय जानि जो डरहुगे। दास तुलसी बेद-बिदित बिरुदावली बिमल जस नाथ ! केहि भाँति बिस्तरहुगे ॥४॥ शब्दार्थ—विप्र = ब्राह्मण, अजामिल । मृदुल = कोमल । मौलिमनि = शिरोमणि । कुटिल = दुष्ट, विकारी । मलिन = पापी । बिरुदावली = गुणावली । भावार्थ—हे रघुवंशमणि ! क्या कभी आप मुझपर वह कृपा करेंगे जिस कृपासे व्याध, गजेन्द्र, अजामिल आदि दुष्ट मनुष्य तरे थे ? हे नाथ ! क्या आप उन लोगोंके समान मुझे भी मानकर मेरा उद्धार करेंगे ? ॥१॥ बहुतसी योनियोंमें जन्म लेकर मैंने नाना प्रकारके दुष्ट कर्म किये हैं; किन्तु आप मेरे नीच आचरण- को हृदयमें न लाइयेगा । आप दीनोंके हितू, अजेय, सर्वज्ञ, सामर्थ्यवान और प्रणतपाल हैं ! क्या आप अपने कोमल चित्तसे अपने (इन नामोंके) गुणोंका अनुसरण करेंगे ? अर्थात् आप दीनोंके हितू हैं, अतः क्या मुझ दीनका हित न करेंगे ? आप अजेय हैं, अतः क्या मेरे काम-क्रोधादि शत्रुओंको परास्त न करेंगे ? आप सर्वज्ञ हैं, अतः क्या मेरे हृद्गत भावोंको न समझेंगे ? आप समर्थ हैं, अतः क्या मुझ अधर्मीको अपने सामर्थ्यसे न तारेंगे ? आप प्रणतपाल हैं, अतः क्या मुझ शरणागतका पालन न करेंगे ? ॥२॥ क्या आप (मेरे हृदय-स्थित) मोह, मद, मान, काम आदि दुष्टोंकी मण्डलीको उनके परिवार-सहित समूल नष्ट करके मेरे असह्य दुःखोंको दूर करेंगे ? क्या आप योग, जप, यज्ञ और