भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 366

विनय-पत्रिका ३५५ विज्ञानकी अपेक्षा अत्यधिक निर्मल अपनी दृढ़ भक्ति (अनन्य भक्ति) देकर मेरे हृदयमें परमानन्द भरेंगे ? ॥३॥ यदि आप अपने हृदयमें इस तुलसीदासको मन्द पुरुषोंका शिरोमणि, सब प्रकारके साधनोंसे हीन, कुटिल मनवाला और मलिन समझकर डरेंगे (कि इतने बड़े पातकीका उद्धार करनेसे लोक-निन्दा होगी), तो हे नाथ ! आप वेद-विख्यात अपनी विरुदावली और विमल यशका विस्तार किस प्रकार करेंगे ? ॥४॥ विशेष १—'सकुल'—झूठ बोलना, छल-कपट, निन्द्य कर्म आदि ही काम-क्रोधादि खलोंके परिवार हैं । क्योंकि कामादिसे ही उक्त दुर्गुणोंकी उत्पत्ति होती है । २—'व्याध'—९४ पदके विशेषमें देखिये । ३—'गज'—२१५ पदके विशेषमें देखिये । ४—'विप्र'—अजामिल; ५७ पदके विशेषमें देखिये । राग केदारा [ २१२ ] रघुपति विपति-दवन । परम कृपालु, प्रनत-प्रतिपालक, पतित-पवन ॥१॥ कूर, कुटिल, कुलहीन, दीन, अति मलिन जवन । सुमिरत नाम राम पठये सब अपने भवन ॥२॥ गज-पिंगला-अजामिल से खल गनै धौं कवन । तुलसिदास प्रभु केहि न दीन्हि गति जानकी-रवन ॥३॥ शब्दार्थ—दवन = दमन, नाश करनेवाले । पवन = पवित्र करनेवाला । जवन = जो । भावार्थ—श्रीरघुनाथजी विपत्तियोंका नाश करनेवाले हैं। वह बड़े ही