विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ विनय-पत्रिका कृपालु, दीनोंको पालनेवाले तथा पापियोंको पवित्र करनेवाले हैं ॥१॥ क्रूरों, दुष्टों, नीचों, गरीबों और अत्यन्त मलिन या पापियोंको भी नामका स्मरण करते ही रामजीने अपने धाममें भेज दिया ॥२॥ गजेन्द्र, पिंगला बेश्या तथा अजामिल आदि दुष्टोंकी गणना कौन कर सकता है ? (थोड़ेमें यों कहा जा सकता है कि) तुलसीदासके प्रभु जानकी-वल्लभ श्रीरामजीने किसे मुक्त नहीं कर दिया ? ॥३॥ विशेष १—'पवन'—वियोगी हरिजीने लिखा है, “पवन=पवित्र करनेवाला; शुद्ध शब्द 'पावन' है । यह आर्ष प्रयोग है।” किन्तु वास्तवमें 'पवन' शुद्ध संस्कृत शब्द है, आर्ष प्रयोग नहीं है। यह 'पूञ् पवने' धातुसे बना है। इसका अर्थ है 'पवित्र करनेवाला'। इसीसे वायुको भी पवन कहते हैं। क्योंकि वायुसे सब वस्तुएँ पवित्र होती हैं।—मेदिनी कोषमें भी लिखा है, 'कुम्भकारस्य आमघटादिपाकस्थानम्, पवित्रीकरणं च' अर्थात् कुम्भारके घड़ा आदि बर्तन पकानेका स्थान 'आवाँ' । २—'जवन'—इसका अर्थ पतित 'यवन' भी हो सकता है। इसका इतिहास पीछे लिखा जा चुका है। ४६ पदके विशेषमें देखिये। ३—'गज'—२१५ पदके विशेषमें देखिये। ४—'पिंगला'—९४ पदके विशेषमें देखिये। ५—'अजामिल—५७ पदके विशेषमें देखिये। [ २१३ ] हरि-सम आपदा-हरन । नहिं कोउ सहज कृपालु दुसह दुख-सागर-तरन ॥१॥ गज निज बल अवलोकि कमल गहि गयो सरन । दीन बचन सुनि चले गरुड़ तजि सुनाभ-धरन ॥२॥