विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 368, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३५७ द्रुपदसुता को लग्यो दुसासन नगन करन । 'हा हरि पाहि' कहत पूरे पट बिबिध बरन ॥३॥ इहै जानि सुर-नर-मुनि-कोबिद् सेवत चरन । तुलसिदास प्रभुको अभय कियो नृग-उद्धरन ॥४॥ शब्दार्थ—सुनाभ = चक्रसुदर्शन । कोबिद = पण्डित, ज्ञानी । नृग = एक राजाका नाम, राजा नृग । भावार्थ—भगवान्के समान आपदाओंको हरनेवाला, स्वाभाविक कृपालु तथा असह्य दुःख-सागरसे पार करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ॥१॥ जब गजेन्द्रने अपना बल देखकर (अपने बलकी परीक्षा कर चुकनेके बाद) कमल-पुष्प लेकर आपकी शरणमें पहुँचा, तब आप उसके दीन वचन सुनते ही चक्रसुदर्शन लेकर गरुड़को छोड़ (पैदल ही) चल पड़े ॥२॥ जब दुःशासन द्रौपदीको (भरी सभामें) नग्न करने लगा, तब उसके 'हा प्रभो ! रक्षा करो' कहते ही अनेक रंगकी साड़ियोंसे उसे पूर्ण कर दिया—उसकी लाज बचायी ॥३॥ यही सब जानकर देवता, मनुष्य, मुनि और पण्डित आपके चरणोंकी सेवा करते हैं । राजा नृगका उद्धार करनेवाले तुलसीदासके स्वामीने किसको अभय नहीं किया ? (जो कोई भी उनकी शरणमें गया, सबको निर्भय कर दिया) ॥४॥ विशेष १—'सुनाभ'—कुछ टीकाकारोंने इसका अर्थ 'नाभि' लिखा है; किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं जँचता । २—'गज'—२१५ पदके विशेषमें देखिये । ३—'द्रुपदसुता'—९३ पदके विशेषमें देखिये । ४—'नृग'—सत्ययुगमें राजा नृग बड़े दानी थे । प्रतिदिन एक करोड़ गोदान करनेका उनका नियम था। एक बार उनकी गायोंमें भूलसे एक ऐसी गाय आ मिली, जिसे वह एक बार किसी ब्राह्मणको दे चुके थे । राजाने उसे पहचाना नहीं, और दूसरे ब्राह्मणको दे दिया । पहला ब्राह्मण अपनी गायका