विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५८ विनय-पत्रिका पता लगाकर उस ब्राह्मणके पास पहुँचा और उसे चोर समझकर गायके लिए झगड़ा करने लगा । अन्तमें दोनों राजाके पास गये । राजाके राजी करनेपर भी वे दोनों ब्राह्मण राजी नहीं हुए और गाय छोड़कर यह शाप देते हुए चले गये कि 'तुमने हमें धोखा दिया है, इसलिए तुम गिरगिट हो जाओ । विप्रका शाप सत्य हुआ । बेचारे राजा बहुत दिनोंतक, द्वारकाके एक कुएँमें पड़े रहे। कहा भी है, 'कोटि गऊराजा नृग दीन्हें तेउ भव-कूप परे ।' भगवान्ने कृष्णावतारमें उस गिरगिटको कुएँसे निकाला और दिव्य शरीर देकर वैकुण्ठमें भेज दिया । राग कल्याण [ २१४ ] ऐसी कौन प्रभुकी रीति ? बिरद हेतु पुनीत परिहरि पाँवरनि पर प्रीति ॥१॥ गई मारन पूतना कुच कालकूट लगाइ । मातु की गति दई ताहि कृपालु जादवराइ ॥२॥ काम-मोहित गोपिकनि पर कृपा अतुलित कीन्ह । जगत-पिता विरंचि जिन्हके चरनकी रज लीन्ह ॥३॥ नेम तें सिसुपाल दिन प्रति देत गनि गनि गारि । कियो लीन सु आपुमें हरि राज-सभा मँझारि ॥४॥ ब्याध चित दै चरन माऱ्यो मूढ़मति मृग जानि । सो सदेह स्वलोक पठयो प्रगट करि निज बानि ॥५॥ कौन तिन्हकी कहै जिन्हके सुकृत अरु अघ दोउ । प्रगट पातकरूप तुलसी सरन राख्यो सोउ ॥६॥ शब्दार्थ—पाँवरनि = नीचों । कुच = स्तन । कालकूट = विष । जादवराइ = श्रीकृष्ण मँझारि = बीचमें । चित दै = निशाना साधकर । बानि = आदत, स्वभाव । भावार्थ—ऐसी रीति और किस प्रभुकी है जो अपने बाने (की लाज रखने) के लिए पवित्र पुरुषों (ऋषियों) को छोड़कर नीचों (शबरी, चांडाल आदि) पर प्रेम करता हो ? ॥१॥ पूतना अपने स्तनोंमें विष लगाकर मारने