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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 475 में से

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पृष्ठ 370

विनय-पत्रिका ३५९ गयी, किन्तु परम कृपालु भगवान् श्रीकृष्णने उसे माताके समान गति दी (स्वर्गमें भेज दिया) ॥२॥ आपने काम-मोहित गोपियोंपर ऐसी कृपा की थी जिसकी तुलना नहीं की जा सकती, और जिसके कारण जगत्-पिता ब्रह्माने भी उनका (गोपियोंका) चरण-रज लिया ॥३॥ शिशुपाल नियम बाँधकर प्रतिदिन भगवान्- को गिन-गिनकर गालियाँ दिया करता था; किन्तु प्रभुने राज-सभाके बीचमें उसे अपनेमें लीन कर लिया (मारकर मुक्त कर दिया) ॥४॥ मूढ़ बुद्धि व्याधने मृग जानकर निशाना साधकर आपके चरणमें बाण मारा, पर आपने उसे सदेह अपने लोकमें भेजकर अपने (दयालु) स्वभावका परिचय दिया ॥५॥ किन्तु उन लोगोंकी बात कौन कहे जिन लोगोंके पुण्य और पाप दोनों थे (अर्थात् जिन लोगोंने पुण्य और पाप दोनों किये थे ); आपने तो अपनी शरणमें इस तुलसीदासको भी रख लिया जो प्रत्यक्ष पापकी मूर्ति है ॥६॥ विशेष १—आजकलके अधिकांश उपासक भगवान्के अवतारोंमें भेद मानते हैं, किन्तु शास्त्रोंके सिद्धान्तोंपर विचार करनेवाले गुसाईंजीकी इस पदमें अभेद दृष्टि दिखाई पड़ती है । गुसाईंजीकी रचनाओंमें इस प्रकार अभेदकी झलक कई जगह दिखाई पड़ती है । २—'पूतना'—पूर्वजन्ममें एक अप्सरा थी । भगवान् वामनका बाल- स्वरूप देखकर उसे इच्छा हुई कि स्नेहपूर्वक इस बालकको स्तन पिलाऊँ । अन्तमें वह किसी घोर पापके कारण राक्षसी हुईं । कृष्ण भगवान्‌के मामा कंसने स्तनका दूध पिलाकर अविनाशी भगवान् कृष्णको मार डालनेके लिए उसे भेजा था । किन्तु दयालु परमात्माने उसकी बुरी नीयतपर ध्यान नहीं दिया और उसकी पूर्वजन्मकी अभिलाषा पूरी की । ३—'काम-मोहित'—इससे यह न समझना चाहिये कि ब्रजांगनाएँ कुलटा थीं, और भगवान् श्रीकृष्ण उनके साथ रमण करते थे । आजकल लोगोंकी ऐसी ही भ्रान्त धारणा हो गयी है, और पुराणोंके अच्छे-अच्छे संस्कृत टीका- कारोंने श्रीमद्भागवतके दशमस्कंध रासपंचाध्यायीपर इसी दृष्टिकोणसे टीका भी की है । किन्तु यथार्थतः न तो उसका वह अर्थ है और न वह संगत ही प्रतीत