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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 371

३६० विनय-पत्रिका होता है। सोचिये न ! कृष्णजी पूर्णावतार माने जाते हैं। अवतार हुआ करता है, अधर्मका नाश करके धर्मकी स्थापना करनेके लिए। यह स्वयं सिद्ध है कि कृष्ण पूर्णावतार थे। उनके पूर्णत्वमें किसी तरहका सन्देह नहीं। जिस बातको वेद-शास्त्र एक स्वरसे कह रहे हैं, जिसकी पुष्टि बड़े-बड़े तत्त्ववेत्ता ऋषि-मुनिँ कर गये हैं, उस बातका खंडन कोई भी आस्तिक बुद्धि नहीं कर सकती। और फिर कृष्ण भगवान्‌के प्रत्येक कार्यपर सूक्ष्म बुद्धिसे विचार करनेपर भी यही प्रतीत होता है कि वह पूर्णावतार थे। इस बातको अच्छी तरह समझनेके लिए हमें श्रीमद्भागवतकी उत्पत्तिपर विचार करना होगा। देखिये, शापवश राजा परीक्षित्‌के जीवनकी अवधि केवल सात दिन रह गयी थी। उस समय उन्होंने अपने उद्धारके लिए श्रीमद्भागवतकी कथा सुनी थी। आचार्य चुने गये थे, बालब्रह्मचारी महामुनि शुकदेवजी। अब विचारणीय बात है कि क्या श्रृंगार- प्रधान केलि-कलहपूर्ण कथा सुनकर राजा परीक्षित् मुक्त हो सकते थे? कदापि नहीं। और फिर यदि श्रृंगार-रसकी ही कथा अभिप्रेत होती, तो उसके लिए बालब्रह्मचारी शुकदेवजी उपयुक्त आचार्य क्यों चुने जाते? एक बालब्रह्मचारी वैषयिक बातोंका वर्णन क्या करेगा? इन बातोंसे यह सिद्ध होता है कि श्रीमद्भागवतकी कथा केलि-कलहपूर्ण नहीं है। ब्रजांगनाओंके पवित्र भावका पता एक बातसे और चलता है; श्रीमद्भागवतमें राजा परीक्षित्‌ने ब्रह्मर्षि शुकदेवजीसे प्रश्न किया कि गोपियोंके काम-मोहित होनेपर भी उन्हें परम-पद कैसे मिला? इसके उत्तरमें महर्षिने कहा कि जिन गोपिकाओंने समस्त संसारको, यहाँतक कि अपने परम प्रिय जीवनको भी भगवान् श्रीकृष्ण- पर न्यौछावर कर दिया और उनसे निष्काम प्रीति की, वे काम-मोहित कैसे कही जा सकती हैं? स्थानाभावके कारण यहाँ उस विषयका विवेचन विस्तृत रूपसे नहीं किया जा सकता। यदि ईश्वरकी कृपा हुई तो मैं इस विषयपर एक स्वतन्त्र पुस्तक लिखूँगा। अब यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि गुसाईंजीने ब्रजांगनाओंको काम- मोहित क्यों कहा? बात यह है कि अन्य-अन्य अवतारोंमें (जैसे रामावतार आदिमें, सूपर्णखा आदि) स्त्रियाँ भगवान्‌के रूप-माधुर्यपर मुग्ध होकर उन्हें पतिरूपमें अथवा प्रेमीके रूपमें देखना चाहती थीं और भगवान्‌ने अपने