भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 475 में से

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पृष्ठ 372

विनय-पत्रिका ३६१ कृष्णावतारमें उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेका वचन दिया था। (जाकी रही भावना जैसी। प्रभु-मूरति देखी तिन तैसी) किन्तु परमात्माकी प्रेरणासे वे ही कामा- तुर स्त्रियाँ जब गोपियोंके रूपमें उत्पन्न हुईं, तब उनका वह भाव नहीं रह गया। उनमें शुद्ध प्रेम उत्पन्न हो गया। यह है ईश्वर-साक्षात्कारकी महिमा। इससे व्रजांगनाओंका प्रेम सखा-भावमय हो गया। जान पड़ता है कि उसी बातको लक्ष्य करके गुसाईंजीने, यहाँ 'काम-मोहित' लिखा है। अर्थात् गोपिकाएँ तो काम-मोहित होकर अवतरित हुई थीं, पर भगवान्‌ने कृपा करके उनका भाव ही पलट दिया। वास्तवमें व्रजांगनाएँ धन्य हो गयीं। उनके भाग्यकी जितनी प्रशंसा की जाय, थोड़ी है। कविवर रसखानने क्या खूब कहा है:— संकरसे मुनि जाहिं रटैं, चतुरानन आनन चार तें गावैं। सो हिय नैक हि आवत ही, मति-मूढ़ महा 'रसखानि' कहावैं। जापर देव अदेव भुजंगम, बारन प्रानन बार न लावैं। ताहि अहीरकी छोहरियाँ छछियाँ भरि छाँछको नाच नचावैं ॥ —रसखान । ४—'सिसुपाल'—यह चेदि देशका राजा था। आजकल चेदि नगरको चंदेरी कहते हैं जोकि ग्वालियर राज्यके अन्तर्गत है। यह कृष्ण भगवान्‌को प्रतिदिन सौ गालियाँ दिया करता था। यह कृष्णकी बुआका लड़का था। भगवान् अपनी बुआको वचन दे चुके थे कि शिशुपालकी सौ गालियाँतक मैं सह लूँगा। एक दिन पाण्डवोंकी राज्य-सभामें जब शिशुपाल सौसे अधिक गालियाँ देने लगा, तब भगवान्‌ने चक्रसुदर्शनसे उसका सिर काट लिया। देखते ही देखते उसकी आत्म-ज्योति भगवान्‌के श्रीमुखमें प्रवेश कर गयी। ५—'ब्याध'—'जरा' नामक ब्याधकी कथा पीछे लिखी जा चुकी है। इसने पूर्वजन्मका बदला चुकानेके लिए धोखेसे श्रीकृष्णके चरणमें बाण मार दिया था। ९४ पदके विशेषमें देखिये। [२१५] श्री रघुवीर की यह बानी । नीचहूँ सों करत नेह सुप्रीति मन अनुमानी ॥१॥

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