भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 373

३६२ विनय-पत्रिका परम अधम निषाद पाँवर, कौन ताकी कानि ? लियो सो उर लाइ सुत ज्यों प्रेमको पहिचानि ॥२॥ गीध कौन दयालु, जो बिधि रच्यो हिंसा सानि ? जनक ज्यों रघुनाथ ता कहँ दियो जल निज पानि ॥३॥ प्रकृति-मलिन कुजाति सबरी सकल अवगुन-खानि । खात ताके दिये फल अति रुचि बखानि बखानि ॥४॥ रजनिचर अरु रिपु विभीषन सरन आयो जानि । भरत ज्यों उठि ताहि भेंटत देह-दसा भुलानि ॥५॥ कौन सुभग सुसील बानर, जिनहिं सुमिरत हानि । किये ते सब सखा पूजे भवन अपने आनि ॥६॥ राम सहज कृपालु कोमल दीनहित दिनदानि । भजहि ऐसे प्रभुहि तुलसी कुटिल कपट न ठानि ॥७॥ शब्दार्थ—पाँवर = नीच, पापी। कानि = प्रतिष्ठा। सानि = सानकर। जनक = पिता। आनि = लाकर। दिनदानि = सदैव दानी। भावार्थ—श्रीरघुनाथजीकी यह आदत है कि वह अपने मनमें सुन्दर प्रेमका अनुमान करके नीचसे भी प्रेम करते हैं ॥१॥ निषाद अत्यन्त अधम और पापी था। उसकी कौनसी प्रतिष्ठा थी ? किन्तु उसके प्रेमको पहचानकर रामजीने उसे पुत्रके समान हृदयसे लगा लिया ॥२॥ गीध कौनसा दयालु था जिसे ब्रह्मा- ने हिंसा में सानकर (हिंसामय) बनाया था ? किन्तु रामजीने पिताके समान उसे अपने हाथसे पानी दिया ॥३॥ स्वभावकी मलिन और नीच जातिकी शबरी सब अवगुणोंकी खान थी। किन्तु रामजीने उसके दिये हुए फलोंको बड़ी रुचिके साथ बखान-बखानकर खाया ॥४॥ राक्षस और शत्रु विभीषणको शरणमें आया जानकर आपने उठकर उसे भरतकी तरह हृदयसे लगा लिया और (प्रेमकी अधि- कताके कारण) अपने शरीरकी भी सुध भूल गये ॥५॥ बन्दर भला कौनसे सुन्दर और सुशील होते हैं जिनका स्मरण करनेसे भी हानि होती है। किन्तु रामजीने उन बन्दरोंको अपना सखा बनाया था और अपने घर लाकर उनकी पूजा भी की थी (आदर-सत्कार किया था) ॥६॥ रामजी सहज कृपाल,