भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 374

कोमल, दीन-हितकारी और सदैव दान देनेवाले हैं। इसलिए हे तुलसीदास ! तू कुटिलता और कपट न रखकर ऐसे प्रभु (श्री रामजी) का भजन कर ॥७॥

विशेष

१—'निषाद'—१०६ पदके विशेषमें देखिये । २—'गीध'—जटायु; इसने सीताको छुड़ानेके लिए रावणसे युद्ध करके प्राण-त्याग किया था। रामजीने अपने पिताके समान, इसका दाह-संस्कार किया था। ३—'सबरी'—१०६ पदके विशेषमें देखिये ।

[ २१६ ]

हरि तजि और भजिये काहि ? नाहिनै कोउ राम सो ममता प्रनत पर जाहि ॥१॥ कनककसिपु बिरंचि को जन करम मन अरु बात । सुतहि दुखवत विधि न बरज्यो काल के घर जात ॥२॥ संभु-सेवक जान जग, बहु बार दिय दससीस । करत राम-विरोध सो सपनेहुँ न हरक्यो ईस ॥३॥ और देवन की कहा कहौं, स्वारथहि के मीत । कबहुँ काहु न राखि लियो कोउ सरन गयउ सभीत ॥४॥ को न सेवत देत संपति लोकहू यह रीति । दास तुलसी दीनपर एक राम ही की प्रीति ॥५॥ शब्दार्थ—कनककसिपु = हिरण्यकशिपु । हरक्यो = मना किया । ईस = शिवजी । भावार्थ—परमात्माको छोड़कर और किसका भजन किया जाय । रामजी- की तरह ऐसा कोई नहीं है, जिसकी भक्तोंपर ममता हो ॥१॥ हिरण्यकशिपु मन, वचन और कर्मसे ब्रह्माका भक्त था। वह अपने पुत्र (प्रह्लाद) को दुःख पहुँचाने- के कारण, कालके घर चला गया, पर ब्रह्मा उसे न रोक सके (मृत्युसे न बचा सके) ॥२॥ संसार जानता है कि रावण शिवजीका भक्त था और उसने कई बार अपने सिर काटकर शिवजीको चढ़ाये थे। किन्तु जब वह रामजीसे वैर करने