विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ विनय-पत्रिका लगा, तब शिवजीने उसे स्वप्नमें भी मना नहीं किया (परिणाम यह हुआ कि रावण मारा गया और शिवजीने उसकी रक्षा नहीं की) ॥३॥ (जब ब्रह्मा और शिवका यह हाल है, तब) और देवताओंके लिए क्या कहूँ, सब अपने मतलबके यार हैं। कभी भी किसीके भयभीत होकर शरणमें आनेपर उसे किसीने शरण नहीं दी ॥४॥ सेवा करनेपर कौन धन नहीं देता ? (सब लोग देते हैं)। यही संसारकी रीति है। किन्तु हे तुलसीदास ! दीन भक्तोंपर एक रामजीका ही (सच्चा) प्रेम है (अर्थात् रामजी ही अपने भक्तोंकी हर हालतमें रक्षा करते हैं) ॥५॥ विशेष १—‘कनककसिपु’—९३ पदके विशेषमें देखिये। २—‘हरक्यो’—प्रायः सभी प्रतियोंमें ‘हटक्यो’ पाठ है। किन्तु एक हस्त- लिखित प्रतिमें मुझे ‘हरक्यो’ पाठ मिला है। यही पाठ शुद्ध भी जान पड़ता है। [ २१७ ] जो पै दूसरो कोउ होइ । तौ हौं बारहि बार प्रभु कत दुख सुनावौं रोइ ॥१॥ काहि ममता दीन पर, काको पतित-पावन नाम । पाप मूल अजामिलहि केहि दियो अपनो धाम ॥२॥ रहे संभु बिरंचि सुरपति लोकपाल अनेक । सोक-सरि बूड़त करीसहि दई काहु न टेक ॥३॥ बिपुल-भूपति-सदसि महँ नर-नारि कह्यो ‘प्रभु पाहि’ । सकल समरथ रहे, काहु न बसन दीन्हों ताहि ॥४॥ एक मुख क्यों कहौं करुनासिन्धु के गुन-गाथ ? । भक्तहित धरि देह काहू न कियो कोसलनाथ ! ॥५॥ आप से कहुँ सौंपिये मोहि जो पै अतिहि घिनात । दासतुलसी और बिधि क्यों चरन परिहरि जात ॥६॥ शब्दार्थ—करीसहि (करि+ईसहिं) = गजेन्द्रको । टेक = सहारा । सदसि = सभा । नर = अर्जुन । घिनात = घृणा करते हो ।