विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 362, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका : ३५१ सिद्ध-सुर-मनुज-दनुजादि सेवत कठिन, द्रवहिं हठजोग दिये भोग बलि प्रान की ॥३॥ भगति दुर्लभ परम, संभु-सुक-मुनि-मधुप, प्यास पदकंज-मकरंद-मधुपान की। पतित-पावन सुनत नाम बिस्राम-कृत, भ्रमित पुनि समुझि चित ग्रंथि अभिमान की ॥४॥ नरक-अधिकार मम घोर संसार-तम- कूपकहिं, भूप ! मोहिं सक्ति आपान की। दास तुलसी सोउ त्रास नहिं गनत मन, सुमिरि गुह गीध गज ग्याति हनुमान की ॥५॥ शब्दार्थ—भवदीय = आपके। पदत्रान = जूता। आँक = अंश। कूपकहिं = कुएँमें। आपानकी = आपकी। ग्याति = (ज्ञाति) जाति। भावार्थ—हे नाथ ! मुझे दूसरेका अवलम्ब नहीं है। हे करुणानिधे ! मन, वचन और कर्मसे मेरी यह सत्य प्रतिज्ञा है कि मुझे केवल आपकी पनहीका सहारा है ॥१॥ मैं जानता हूँ कि मेरा मन क्रोध, मद, मोह और ममताका घर है; इसीसे मैं ज्ञान-विज्ञानकी बातें नहीं कह सकता। हृदयमें अनेक तरहकी कामनाओंके संकल्पों और वासनाओंको देखकर किसी भी अंशमें मुझे मोक्षकी आशा नहीं है (क्योंकि वासनाओंके आत्यन्तिक लयका नाम ही मोक्ष है, किन्तु वासनाएँ बनी हुई हैं, इसलिए मुक्ति नहीं हो सकती) ॥२॥ यद्यपि वेदोक्त कर्म- धर्मके बिना (स्वर्ग-प्राप्ति) अत्यन्त कठिन है, फिर भी मेरे हृदयमें स्वर्गमें जानेकी लालसा है। इसके सिवा सिद्ध, देवता, मनुष्य एवं राक्षसोंकी सेवा करना बहुत कठिन है। क्योंकि ये लोग हठयोग करने और प्राणोंकी बलि देकर भोग चढ़ाने- से पिघलते हैं (किन्तु यह मेरा किया नहीं हो सकता) ॥३॥ रही भक्ति, सो वह बहुत ही दुर्लभ वस्तु है; क्योंकि आपके चरणारविन्दके मधुर परागको पान करनेके लिए शिव, शुकदेव तथा (अन्यान्य बड़े-बड़े) मुनिरूपी भौंरे प्यासे रहते हैं (ऐसी दशामें मेरे जैसे अकिंचनको वह कैसे मिल सकता है ?)। मैंने सुना है कि आपका नाम पतितोंको पवित्र करनेवाला तथा शान्ति देनेवाला है; फिर भी